आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि “जीना” क्या होता है।
सिर्फ सांस लेना ही जीवन नहीं है, बल्कि हर पल को महसूस करना, प्रकृति को जीना और सच्चाई को स्वीकार करना ही असली जीवन है।
इसी सोच को दर्शाती यह कविता एक सवाल पूछती है—
👉 क्या हमने सच में जीना छोड़ दिया है?
✍️ कविता: हमने जीना छोड़ दिया क्या?
हमने जीना छोड़ दिया क्या?
पर्वतों को निहारना और
हवाओं को छूना छोड़ दिया क्या?
बरसी बदरिया,
पेड़ों की रंगत निखर गई,
ओस की बूंदें
हरी-हरी दूबों से उतरना छोड़ दिया क्या?
अभी तड़पी थी धरती,
अभी जला था सूरज,
दीए की लौ संग-संग
पतंगा जलना छोड़ दिया क्या?
वो आतस की पीड़ा थी,
दो जोड़ियों की क्रीड़ा थी,
अभी रूठे, अभी मनाएँ,
प्रीत में जीना-मरना छोड़ दिया क्या?
Have we Given up on Living? Poem
🌍 समाज और बदलती सोच
बदले हैं लोग,
समय चलता रहा,
कौन कहता है कमी है दुनिया में?
शिकायत की बातों में,
आदमी बदलता रहा।
हमने देखा है दुनिया में—
दो जून की रोटी न मिले मगर,
उसने जीना छोड़ दिया क्या?
🍷 सच्चाई और दिखावा
शराब पीने वाले
पीकर सच बोल देते हैं,
लेकिन जो नहीं पीते,
वो झूठ आसानी से बोल देते हैं।
🎭 शिक्षा और स्वार्थ
शिक्षित होने का मतलब
अब चलन अपनाना हो गया है,
अच्छे कपड़े और अच्छी बोली—
बस मतलब निकालना हो गया है।
👥 भीड़ और सोच
भीड़ में जो शामिल हैं,
वो भीड़ में चलने के काबिल हैं,
मत उम्मीद कर यहाँ किसी से—
स्वतंत्र सोच नहीं,
सभी भीड़ में शामिल हैं।
🧠 बुद्धिजीवी और सच्चाई
प्रोग्रेसिव विचार हो सकते हैं,
लेकिन किसी मूर्ख के गुलाम हो सकते हैं,
एक में चुप्पी और दूजे पर मुखर हो सकते हैं—
नालायक हैं, भले ही बुद्धिजीवी हो सकते हैं।
🌱 संघर्ष और अस्तित्व
वो जंगल के बीचोंबीच,
नहीं किनारों पर पनपते हैं,
न खेत-खलिहानों में,
न बाग-बगीचों में।
वो उग आते हैं—
अनायास ही,
पुराने जर्जर भवन पर,
किसी पेड़ के खोल में।
जहाँ मिलती हैं
विषम परिस्थितियाँ,
अस्तित्व के जद्दोजहद के साथ
जीने का प्रयास करते हुए—
हरदम अकेले,
मगर हरे-भरे से,
संक्षिप्त जीवन।
यह कविता सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि एक आईना है—
जो हमें दिखाता है कि हम जी तो रहे हैं, लेकिन शायद “जीना” भूल चुके हैं।
👉 असली जीवन वही है,
जहाँ हम महसूस करें, सोचें और सच्चाई के साथ जिएं।
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