तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग कविता intellectual-class-poetry
उसके बुद्धिजीवी होने का दावा- सोशल मीडिया पर उसके फालोवर देखकर लगा कि निश्चित ही वह ज्ञानी है । उसके अकाउंट में समसामयिक घटनाचक्र, प्राचीन भारतीय संस्कृति, और समाज पर तीखा व्यंग्य है । जिसे पढ़कर निश्चित है कि जो श्रद्धा वंश इन विषयों को मानते हैं, वह जरूर हीन भावना से ग्रस्त हो जाएगा । खुद को कबीर जैसे प्रस्तुत किए हुए थे । लेकिन जब उसके नज़दीकी व्यवहार से सम्पर्क हुआ तो लगा कि ये सारा ज्ञान दूसरों के लिए है । वह तो मुफ्तखोर निकला । खुद को बड़ा दिखाने के लिए जरूर उसने आलोचनात्मक दृष्टिकोण अपनाए हुए थे । ऐसे ही ज्ञानी हमारे आस-पास हजारों की संख्या में हैं ।
उसके बुद्धिजीवी होने का दावा
बिल्कुल सच निकला
उसने झूठ को सच साबित कर दिया
तर्कों के ऐसे ज्ञाता है
बहस में जंग जीत लिया
कल तलक जिस चीज के समर्थन में थे
आज पलट गया है
बहस ऐसे किए
और वो जंग भी जीत गया है
सरकार किसी की हो
व्यवस्था उसकी है
वो जानता है परिवर्तन
भीड़ उसकी है
दया, करूणा, प्रेम
उनके लिए एक छलावा है
असल इरादे छुपाकर रखना
ऊपरी बातें तो
केवल एक दिखावा है
उससे भला कौन लड़े हैं
बहलाना, फुसलाना ,
दिखावटीपन में जो खड़े हैं
हर आदमी बन जाए बुरा तो अच्छा है
लेकिन सोचता हूं
ये जमाने के लिए कितना अच्छा है
ऐसे बुद्धिजीवियों से कैसे बचा जाए?
कैसे निपटा जाए ?
जो गिरे हुए हैं !!!!
जो सोच नहीं पाते हैं
जो देख नहीं पाते हैं
केवल सुनने हैं
वह धीरे-धीरे
वैचारिक गुलाम बनते हैं
वह मात्र आज्ञापालन करते हैं !!!
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-राजकपूर राजपूत

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