योग पर कविता | योग बहस नहीं, जीवन का संतुलन हैYoga on poem
जीवन में जब रिक्तता का अहसास हो । जहां ठहरने के लिए कोई न खास हो । वहां योग जोड़ते हैं । किसी के कमी को पूर्णता से । जहां ज्ञान ज्योति कलश रूप प्रज्वलित हो कर । जीवन को प्रकाशित करते हैं । योग आध्यात्मिक प्रकिया है । जिसमें मन और आत्मा को जोड़ा जाता है । आंतरिक रूप में । बाह्य रूप में शरीर और प्रकृति के क्रियाकलापों का संतुलन करने का नाम योग है ।योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित बनाने की साधना है। यह किसी एक धर्म, जाति या विचारधारा तक सीमित नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए आत्मानुभूति और जागरूकता का मार्ग है। प्रस्तुत कविता योग के इसी व्यापक स्वरूप को रेखांकित करती है और बताती है कि सच्चा ज्ञान बहस से नहीं, बल्कि अभ्यास, अनुभव और विनम्रता से प्राप्त होता है। योग जीवन में जरूर अपनाइये । पढ़िए इस पर कविता 👇👇
योग
योग कोई बहस का विषय नहीं,
जिस पर अंतहीन विवाद किया जाए।
न वह केवल किसी धर्म की सीमा है,
न किसी एक समाज का परिचय है।
हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई—
इन सबसे परे,
योग मानवता की साधना है,
जिसे जीवन में अपनाया जाए।
योग तो जोड़ है—
शरीर और मन का,
आत्मा और तन का।
योग संतुलन है—
प्रकृति और चेतना का,
जीवन और जीवन-दृष्टि का।
योग वह मार्ग है
जिस पर चलकर
मनुष्य स्वयं को पहचानता है,
और सम्पूर्ण सृष्टि में
अपने अस्तित्व का अनुभव करता है।
योग बाहर से भीतर की यात्रा है,
और भीतर से बाहर का विस्तार।
यह मनुष्य को
मनुष्य से जोड़ता है,
करुणा, शांति और जागरूकता से भरता है।
जिसने ध्यान की गहराई को नहीं जाना,
उसने अनुभव का प्रकाश कहाँ पाया।
केवल सुन लेने से ज्ञान नहीं मिलता,
ज्ञान तो अभ्यास से
धीरे-धीरे प्रकट होता है।
तुम ज्ञान पर भी
बहस करते हो,
पर क्या कभी
उसे जीवन में उतारते हो?
जिस ज्ञान में अभ्यास नहीं,
वह अधूरा रह जाता है।
अनुमान अनुभव का विकल्प नहीं,
और तर्क अनुभूति का स्थान नहीं ले सकता।
योग कहता है—
पहले स्वयं को जानो,
फिर संसार को समझो।
क्योंकि परिवर्तन
विचारों से नहीं,
आचरण से शुरू होता है।
जो किसी भी परम्परा,
आस्था या समुदाय का
अपमान करके
स्वयं को बुद्धिजीवी समझता है,
वह ज्ञान नहीं,
केवल विवाद फैलाता है।
सच्चा ज्ञान
सम्मान करना सिखाता है,
संवाद करना सिखाता है,
और मतभेद के बीच भी
मानवता को बचाए रखना सिखाता है।
योग का मार्ग यही है—
जोड़ना,
तोड़ना नहीं।
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