मेरे होंठों पे शिकायत थी कविता हिन्दी ghazal on complaint hindi

होठों पर शिकायत हिंदी गजल 


मेरे होंठों पे शिकायत थी
शायद ! उसी से मोहब्बत थी
उसे मेरा नाम लेना गवारा लगा
उसके हर लफ़्ज़ों में गैरों की बात थी
जहां भी ज़िक्र हुआ गौर से सुना
मेरा ज़िक्र ना करना उसकी शराफ़त थी
मेरी दिल्लगी अजीब थी यारों
इश्क़ करता रहा जिसे मोहब्बत नहीं थी !!

गजल हिंदी कविता 

पता था मोहब्बत नहीं
दिल में ऐसी कोई बात नहीं
सोचा व्यवहार ही निभा दूं
जिसके सामने मेरी इज्जत नहीं
वो अहसानफरामोश है
कर्ज़ चुकाने की आदत नहीं
मैं सोचा कभी समझेंगे
जिसका ख्याल रखने की आदत नहीं
बंजर जमी भी हरा हो जाता
लेकिन कोई बरसात नहीं  !!!

मेरी शिकायत न समझ सकी 
मोहब्बत इसलिए बढ़ न सकीं 
अहम से वहम पाले बैठे हैं 
शिकायत में मोहब्बत न देख सकीं!!!

अभी उसकी दुश्मनी है 
मैंने मोहब्बत मांगी मगर 
उसने नफ़रत जानी है 
ठहरा पास तो समझा उसको 
मतलब निकालना जिसने ठानी है !!!!

---राजकपूर राजपूत''राज''
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