Avlamban - Prem ka

मेरा-
तेरी ओर खिंचाव
सहज आकर्षण हो सकता है
या फिर देखा होगा तुझमें
या तेरी नज़रों में
एक दर्द 
तुम्हारी ऑ॑खों में
मेरे प्रति 
अपार प्रेम
जो जागृत हो गई थी
तेरे लिए..!
शायद..!
कह नहीं सकता 
कुछ भी..

प्रेम में

Avlamban - Prem ka


तेरी ऑ॑खें
स्वीकार कर रही थी
सहज ही
मेरे एहसासों को
तेरी झूकी नज़रें
बयां कर रही थी
एक दूसरे का हाल

उस वक्त भूल गया था
मुझे क्या हो रहा था..?
मेरे अंतर्मन में
एक ज्योति 
प्रज्वलित हो गई थी
जो स्फूटित हो कर
पूरे जिस्म में
फैल गई थी
जिससे मेरा चेहरा
खिल गया था
गुलाब की तरह

न जाने कैसे.?
अब तक
गुजार दिए
जिंदगी अपनी
तेरे बगैर
मुझे अहसास हुआ
तेरे पास आ के
तेरा अवलंबन पा के
अपनी सम्पूर्णता का
भास हुआ !!!!

अवलंबन 

जब से मिला
तो मैं टिक गया
सूरज और चांद जैसे
धरती और आकाश जैसे
स्थिर हो कर
एक ही दिशा में
निरंतर गति के साथ
चलते गया
तुम्हारे आस-पास सिर्फ !!!

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___राजकपूर राजपूत