बजट क्या है,मुफ्तखोरी और सरकारी व्यवस्था: समस्या और समाधान Budget-what-is-article

अक्सर देखा गया है कि कुछ लोग सरकार से अत्यधिक उम्मीद लगाकर रहते हैं। मुफ्तखोरी करना सीख जाते हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए सजग रहते हैं। अपना वास्तविक काम छोड़कर वे सियासत और सियासतदानों की चापलूसी में समय गंवाते हैं।

इसके बावजूद उनकी अपेक्षाएँ कभी पूरी नहीं होतीं। चाहे कितने भी लाभ मिले, वे संतुष्ट नहीं होते और लगातार सरकार की आलोचना करते हैं। ऐसे मुफ्तखोर और अकर्मण्य लोग सरकार पर बोझ बन जाते हैं। ध्यान रहे, बजट देश के हित को ध्यान में रखकर बनाया जाता है, न कि किसी व्यक्ति के लिए। अगर सच में देशभक्ति है, तो देश को देना सीखिए, लेना नहीं। किसी भी स्थिति में देश या सरकार का बोझ न बनें।

यदि किसी का जीवन पूरी तरह सरकार के बजट पर निर्भर हो, तो यह देश और स्वयं व्यक्ति दोनों के लिए घातक है।

मुफ्तखोरी और रिश्वत:

मुफ्तखोरी का एक रूप रिश्वत लेना और देना भी है। व्यवस्था सरकार संचालित करती है, लेकिन बेहतर क्रियान्वयन की जिम्मेदारी पढ़े-लिखे अधिकारियों पर है। कई अधिकारी पद और अवसर का फायदा उठाकर अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए व्यवस्था का उपयोग करते हैं। समझदार अधिकारी इस प्रक्रिया को इस तरह संभालते हैं कि वे सरकार के नियमों का पालन करते हुए अपने लाभ की सुरक्षा भी कर सकें।

कई ऐसे अधिकारी भी हैं जो शॉर्टकट अपनाते हैं। ये लाइन में खड़े होने से बचते हैं और अपने पैसों या संपर्कों से कार्य निकलवा लेते हैं। छोटे स्तर पर इसे व्यवहार में “चाय-पानी” जैसी गतिविधियों के रूप में देखा जा सकता है। इस आदत की वजह से रिश्वतखोर हर किसी से मांग करते हैं, ताकि अपनी नीयत सफल हो।

कई सरकारी कर्मचारी मूल दायित्वों को छोड़कर पार्ट-टाइम काम करते हैं। वे जानते हैं कि सरकारी नौकरी कहीं नहीं जाएगी और निकालना मुश्किल है, इसलिए ड्यूटी केवल कागजों तक सीमित रह जाती है। ऐसे लोग अपनी अन्य गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं। कई सरकारी संस्थानों में इस प्रकार की मानसिकता देखी जा सकती है।

समाज और व्यवस्था:

व्यवस्था इतनी जटिल और स्वीकृत हो गई है कि यह समाज में आम व्यवहार का हिस्सा बन चुकी है। लोग इसे देख कर सीखते हैं और इसमें शामिल हो जाते हैं। अब इसे आसानी से छोड़ना कठिन है, शायद ही कोई इसे पूरी तरह बदल सके।

-राजकपूर राजपूत राज 

इन्हें भी पढ़ें 👉 व्यवस्था! लेख 

                                        गुस्सा लेख