जीत, हार और अतृप्त मन | जीवन-दर्शन पर हिंदी कविता /prem aur jeevan darshan-kavita
जीवन में जीत और हार केवल बाहरी उपलब्धियों से नहीं मापी जातीं। कई बार जो व्यक्ति दुनिया की नज़र में जीत जाता है, वह अपने भीतर कुछ अनमोल खो देता है। वहीं जो हारता हुआ दिखाई देता है, वह प्रेम, आत्मसम्मान और सच्चाई को बचाकर वास्तविक विजय प्राप्त कर लेता है। प्रस्तुत कविता प्रेम, इच्छाओं की अतृप्ति और मनुष्य के आचरण पर एक चिंतन है।
जीत और हार कविता
तू जीत के बाद भी हार गई,
मैं हार के भी जीत गया।
तू दुनिया की नज़रों में सफल हुई,
मैं दिल की दुनिया में ठहर गया।
जीत की ख़ुशी में तू भूल गई प्यार,
मेरे सीने में तेरी मोहब्बत रह गई।
मंज़िल तेरे हिस्से आई होगी,
पर यादें मेरे साथ रह गईं।
अतृप्त मन
अतृप्त मन की उपज ऐसी,
जिसकी पूर्ति कभी नहीं होती।
अनंत इच्छाओं की डोर से बंधी,
हर चाहत नई चाहत को जन्म देती।
उलझा रहता है मन संसार में,
दूसरों से आगे निकलने की होड़ में।
पर जो स्वयं को जीत लेता है,
वही सच्चे अर्थों में मुक्त होता है।
पढ़े-लिखे लोग कविता
तुम पढ़े-लिखे ज़्यादा हो,
इसलिए बहस भी ज़्यादा हो।
सभ्यता का पाठ सीखा है तुमने,
पर सच पर पर्दा भी ज़्यादा हो।
दावों के हिसाब से तुममें,
ईमानदारी कुछ ज़्यादा हो।
लेकिन शब्दों से नहीं,आचरण से पहचान होती है।
ज्ञान वही सार्थक हो
जो विनम्रता के साथ जीया जाता है।
वहीं सफल हो !!!!
और अंत में कविता
जीत का मूल्य तभी है जब उसके साथ प्रेम, संवेदना और सत्य भी बचे रहें। इच्छाओं का अंत नहीं, लेकिन संतोष का आरंभ मनुष्य को शांति देता है। और ज्ञान की असली पहचान तर्कों से नहीं, बल्कि व्यवहार से होती है।
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