लेख: नैतिक जिम्मेदारी और आधुनिक समाज 🌸
पहले नैतिक जिम्मेदारी समाज की थी।
लोग किसी भी काम या बात करने से पहले समाज की परवाह करते थे।
लेकिन आजकल स्थिति बिल्कुल उल्टी हो गई है।
कुछ करने या कुछ कहने से पहले लोग केवल अपने व्यक्तिगत हितों के बारे में सोचते हैं, समाज की नहीं।
जो नैतिक मूल्य पहले अत्यंत महत्वपूर्ण थे, वे अब हासिए पर चले गए हैं।
युग नहीं बदले हैं, केवल व्यक्तियों के नजरिए बदल गए हैं।
शिक्षित होने का संतोष अक्सर इस बात में होता है कि व्यक्ति बोल तो लेता है, यानी वह मत निकाल लेता है, उन मान्यताओं पर जिनसे वह नफ़रत करता है।
वे वही सुनते हैं जो उनका आदर करते हैं।
इसमें अंतर यह है:
बोलने वाला: अक्सर अमर्यादित आचरण करता है।
सुनने वाला: विनम्र और झिझक भरा रहता है।
कभी-कभी नग्नता का प्रदर्शन मानसिक स्थिति को विचलित कर देता है, जिसके कारण सुनने वाला चुप रह जाता है।
आज के जमाने में निर्लज्जता का मुकाबला करना हो, तो उसी स्तर पर आना पड़ता है।
लेकिन यह कठिन है, क्योंकि सुनने और सहने वालों के लिए इसे अपनाना मुश्किल होता है।
लोग शराफत बनाए रखते हैं ताकि कीचड़ में पत्थर उछालना उचित न लगे।
फिर भी, निर्लज्जता धीरे-धीरे बार-बार आलोचना करके लोगों की टोली बना लेती है।
सुनने और सहने वाले ऐसा नहीं कर पाते।
निरंतरता से आलोचना करना एक नजरिया बन जाता है,
जो धीरे-धीरे रक्त में शामिल होकर डीएनए में समाहित हो जाता है।
यह संस्कार पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं।
इस तरह चरित्र में दोगलापन स्थापित होता है, जो समाज की मूलभूत बुद्धि की रक्षा नहीं करता।
आजकल का सबसे बड़ा निर्लज्जता का गुण है दोगलापन।
जिसने इसे अपनाया, वह देश, धर्म और समाज को निश्चित रूप से खोखला कर देगा।
🌟 और अंत में लेख 🌟
समाज और नैतिकता की रक्षा के लिए आवश्यक है कि हम व्यक्तिगत स्वार्थ पर आधारित नजरियों से ऊपर उठें।
निर्लज्जता और दोगलापन न केवल व्यक्तित्व को कमजोर करते हैं, बल्कि समाज और देश के मूल्यों को भी प्रभावित करते हैं।
हमारी जिम्मेदारी है कि हम वास्तविक नैतिकता और सच्चे मूल्यों को बनाए रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्थिर और जागरूक समाज का हिस्सा बनें।
-राजकपूर राजपूत "राज "
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2 टिप्पणियाँ
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