विचारों की कैद : पूर्वाग्रह, दिखावा और आत्ममंथन पर हिंदी कविता /purvagrah aur atmamantan kavita
जब मनुष्य किसी विचार, मान्यता या पूर्वाग्रह से अत्यधिक बंध जाता है, तो वह स्वयं को परखने की क्षमता खो सकता है। तब विचार विकास का माध्यम न रहकर सीमाओं का कारण बन जाते हैं। यह कविता आत्ममंथन, वैचारिक कठोरता और सामाजिक दिखावे पर प्रश्न उठाती है।
विचारों की कैद कविता
जब किसी विचारों में बंध जाते हैं
खुद में सुधार की उम्मीद भूल जाते हैं
किसी पुर्वाग्रही कि तरह हठ पूर्वक
खुद के भीतर ही ऐंठ जाते हैं
गुंजाइश नहीं है फिर नए विचारों का
केवल गैरों का आलोचना कर जाते हैं
कर नहीं सकते अच्छे-बुरे का फैसला
जहॉं लालच हो वहॉं चुप हो जाते हैं
अपना चुपके-चुपके इरादे साधना
पहन के कुछ कपड़े स्मार्ट हो जाते हैं !!!
हिंदी वैचारिक कविता
प्रदर्शित करना है
किसी से कम नहीं कहना है
जब भी घर से निकलो
अंग्रेजी शब्दावली में कहना है
सभ्यता की शर्तें हैं
बातों से नम्रता और मन में कुछ और रखना है
तथाकथित बुद्धिजीवियों ने यही सिखाया है
मतलब के लिए जीना मरना है
पेट दिखाओ, भूखा बताओ
सरकार से बस कहना है !!!!!
और अंत में कविता
विचार तब तक उपयोगी हैं जब तक वे सीखने, समझने और विकसित होने का अवसर दें। यदि वे हमें प्रश्न पूछने, स्वयं को बदलने और दूसरों को समझने से रोकने लगें, तो वे विचार नहीं, बंधन बन जाते हैं।
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