उम्मीदों की फसलें कविता expectation Kavita

उम्मीदों की फसलें कविता expectation Kavita

 उम्मीदों की फसल

जब भी बोई है

किस्मत की हर बार दुहाई है

मन भर खाया है कीट-पतंगों ने

बच गई थोड़ी बहुत उसे

बेमौसम बरसात से गवाई है

फिर भी उम्मीद नहीं टूटी

नई फसल उगाई है

इसलिए चहुंओर धरती पे

हरियाली छाई है !!!!

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भीड़ में शामिल हो कर 

कुत्ते डरा रहे हैं 

उसे पता है 

हमला कैसे करना है 

एक के चुप होने पर 

दूसरे को भोंकना है 

एकजुटता में वो ताकत है 

शेर को भी भकाना है 

सोशल मीडिया पर 

ऐसे देशद्रोही लोगों का जमावड़ा है !!!!!


जब देश सीमाओं में बंधने लगे 

वो मुझे आकर कहने लगे 

इंसानियत बड़ी चीज़ है 

मैंने सोचा कितना सही है 

कोई इंसानियत से बड़ी नहीं है 

और धीरे-धीरे मैंने देखा 

उनके सियासी विचार सीमाएं नापने लगे 

स्थापित किए कई राष्ट्र

जहां उसके विचार को मानना भी इंसानियत थी 

जबकि आदमी मरने लगे 

अपने विचार से !!!!

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