विश्वास और नजरिया- समाज और अंतर्मन की कविता vishwas-aur-agenda-samaj-antarman

विश्वास और नजरिया - समाज और अंतर्मन की कविता vishwas-aur-agenda-samaj-antarman

विश्वास केवल समाज से नहीं, बल्कि हमारे अंतर्मन से भी बनता है। यह कविता दो तरह के विश्वासों की तुलना करती है—एक जो समाज और पूर्वाग्रहों से मिलता है, और दूसरा जो अंतर्मन की गहराई से झाँक कर आता है। इसमें यह बताया गया है कि प्रेम और नफ़रत, तर्क और एजेंडा, समाज की सोच और व्यक्ति के अनुभव को कैसे प्रभावित करते हैं। पढ़िए इस पर कविता हिन्दी 👇 

विश्वास दो तरह के होते हैं कविता 

विश्वास दो तरह के होते हैं—
एक समाज से लिया हुआ,
पूर्वाग्रही की भांति।
दूसरा अंतर्मन से झाँका हुआ,
जिसे बदल पाना मुश्किल होता है।
हर किसी के भीतर होती है
मात्रा नफ़रत और प्रेम की।
अगर प्रेम को तोड़ना है,
तो नफ़रत से जोड़ना है।
अगर नफ़रत को तोड़ना है,
तो प्रेम से जोड़ना है।
इसमें ज्यादा सोच की जरूरत नहीं है,
आपका एहसास निर्धारण करता है
आपके नजरिए और विश्वास को।


कोई विश्वास में पढ़ रहा है

कोई अपने नजरिए से लिख रहा है।
कोई ज्ञान की पिपासा में,
जीने की आशा में,
तुम्हें देख रहा है।
तुम एजेंडा धारी,
तर्क में फर्क लिख रहा है।
इसलिए अच्छा समाज नहीं दिख रहा है,
मन अशांत है,
जिसके कारण उनकी बात में
हर चीज़ में थकावट ले आती है।
हंसती आँखों में शंका भर देती है,
कौन चाहता है ऐसे ज्ञानचंदों को
फारवर्ड करें उनके ज्ञान को।
न खुद अपने जीवन में उतर सके,
जो अच्छा है उसे भी उतार चुके।
निर्लज्जता जिसकी ताक़त है,
जिंदगी जिसकी लानत है,
वहीं उपदेश दे रहा है।
वो एजेंडा धारी,
फर्क में तर्क लिख रहा है।

-राजकपूर राजपूत "राज "
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