प्रेम, जीवन और एजेंडा: एक हिंदी कविता prem-aur-agenda-hindi-kavita

प्रेम, जीवन और एजेंडा: एक हिंदी कविता prem-aur-agenda-hindi-kavita

प्रेम और जीवन की तलाश हर इंसान के लिए अहम होती है। लेकिन कभी-कभी समाज में, राजनीति में और व्यक्तिगत जीवन में ऐसे लोग मिलते हैं जो अपने एजेंडे और मानकों के लिए प्रेम और जीवन की सच्ची खोज को रोक देते हैं। यह कविता “प्रेम और एजेंडा” इसी जटिलता और विरोधाभास को दर्शाती है – कैसे प्यार, जीवन और ईश्वर की खोज के बीच इंसान खुद को खो देता है, जबकि बाहरी दुनिया अपने नियमों और एजेंडों में उलझी रहती है।

जरा जरा सी रौशनी
की उम्मीद में हम
दीए जलाए बैठे हैं
तुम आओगे कभी लौटकर
इसलिए खुद को जलाए बैठे हैं !!!

कविता: प्रेम और एजेंडा

वो प्रेम ढूंढता रहा 
जीवन ढूंढता रहा 
मगर कोई है जो 
हर जगह एजेंडा ढूंढता रहा 

हुआ युद्ध ईरान से 
खाद की कमी हुई 
उसने हिन्दू आस्था को मज़ाक बनाया 
जिसकी जिम्मेदारी हुई 
आतंकी ने गला रेता ध्यान नहीं दिया 
वहीं एजेंडा धारी ने ज्ञान नहीं दिया 
जोड़कर -तोड़कर पेट से जोड़ा 
अपने एजेंडे को जोड़ा 
आस्था पर चोट किया इस तरह 
पेट से भूखा सदा है इस तरह 
ज्ञान इसी को कहता रहा 
वो प्रेम ढूंढता रहा 

स्थापित करना है अपने मापदंडों को 
माइंड सेट करना है अपने एजेंडे को 
ईश्वर बदलेगा तब भगवान मिलेगा
जिहाद का मकसद है कुर्बान हो 
मरो मारो, जन्नत मिलना आसान हो 
मारने वाला हंसता रहा 
मरने वाला रोता रहा 
कोई प्रेम ढूंढता रहा 
जीवन ढूंढता रहा !!!

खुद को जलाए बैठे हैं 
ज्ञान ऐसे बनाए बैठे हैं 
कभी सोच नहीं पाता सोशल मीडिया से बाहर 
और चेहरे लटकाए बैठे 
खुद को जलाए बैठे हैं 

शिक्षित हुए हैं डिग्री से 
अनुमान लगाए हैं बेफ़िक्री से 

उपयोग नहीं कर पाया है व्यवहार में 
रिश्ते-नाते चल नहीं पाया उसके व्यापार में 
दिल टूटे-फूटे बैठें हैं 
खुद को जलाए बैठे हैं 
ज्ञान ऐसे बनाए बैठे हैं !!!!

-राजकपूर राजपूत "राज "
prem-aur-agenda-hindi-kavita






Reactions

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ