दिल से निकाल दिया — हिंदी कविता thought-provoking hindi poem
यह कविता सामाजिक संरचना, व्यक्तिगत हित और नैतिकता के बीच के संघर्ष को उजागर करती है। यह दिखाती है कि कैसे लोग दिखावे और वास्तविकता में भेद कर, अपने स्वार्थ के अनुसार निर्णय लेते हैं।
दिल से निकाल दिया (कविता)
दिल से निकाल दिया,
जिसने कभी हमें चाहा नहीं।
होती तौहीन अपनी ही,
आखिर उसने समझा नहीं।
वो पेड़ काट चुका है,
यह जानते हुए कि
धरती के लिए जरूरी है।
उसने अपने अधिकांश व्याखानों में
सबको बताया कि पेड़ जरूरी है।
ताली बजाई,
सुंदर सभी ने।
लेकिन जब उसकी जरूरत आई,
तो उसने प्राथमिकता दी अपने हितों की।
अब वह पेड़ काट चुका है,
सबको समझा चुका है,
उसका पेड़ काटना सही है।
सभी मान चुके हैं,
क्योंकि वह प्रभावशाली व्यक्ति था,
एसी और कूलर में रहने वाला,
गमलों में पौधे लगाने की क्षमता रखता था।
चारों तरफ उसने क्रांकिट और टाइल्स बिछा दिए,
पेड़ के लिए जगह नहीं।
पौधे गमलों में ठीक लगे,
उसके व्यक्तित्व के हिसाब से।
समझता था सब कुछ,
लेकिन मानता था कुछ-कुछ।
जैसे नैतिकता, समाज,
देश, संस्कृति।
उसने बहुत कुछ बताया,
लेकिन छिपाया भी बहुत कुछ।
अपने हितों और विचारों के टकराव में,
न्याय नहीं।
जिसे बताया नहीं कुछ,
उसने ढंक दिया।
चालाकी और दोहरे मापदंड से जीता,
समझने नहीं कुछ।
कविता का अर्थ
यह कविता सामाजिक और व्यक्तिगत स्वार्थ, नैतिकता और दिखावे के टकराव को दर्शाती है। यह हमें याद दिलाती है कि वास्तविकता और दिखावा अक्सर अलग होते हैं, और हमें अपने मूल्य और नैतिकता बनाए रखने चाहिए।
जीवन और संदेश
व्यक्ति के स्वार्थ और वास्तविकता को समझना जरूरी है।
नैतिकता और समाज के मूल्यों को ध्यान में रखना जीवन को सार्थक बनाता है।
दिखावे और वास्तविकता के बीच फर्क पहचानना आत्म-संतुलन के लिए आवश्यक है।
निष्कर्ष
“दिल से निकाल दिया” केवल एक कविता नहीं, बल्कि सामाजिक और व्यक्तिगत स्वार्थ की गहराई को समझने का माध्यम है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन में नैतिकता और अपने मूल्यों का पालन सबसे महत्वपूर्ण है।
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-राजकपूर राजपूत राज
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