हृदय की पुकार: प्रेम और विरह की अनकही कविताएँ

हृदय की पुकार: प्रेम और विरह की अनकही कविताएँ


कभी-कभी जीवन में प्रेम और विरह के भाव इतने गहरे होते हैं कि शब्द उनके लिए खुद ब खुद ढूँढे जाते हैं। इस कविता में एक दिल की गहराई से निकलती भावनाएँ हैं, जो अपने अनुभव और यादों के माध्यम से प्रेम की शक्ति और उसकी अनकही पीड़ा को दर्शाती हैं। यह लेख उन सभी पाठकों के लिए है, जो प्रेम और विरह की संवेदनाओं को महसूस करना चाहते हैं।

आठों पहर दिल में ख्याल है आपका
पूछते हैं लोग क्या हाल है आपका

मेरी हालत ही ऐसी है कुछ नहीं भाते
मेरी धडकनों में सिर्फ नाम है आपका !!!

प्रेम की गहराई और विरह


तुम मेरे प्रेम कविता को 
अपने लिए मत समझो 
मेरे भावों का मिलान मत करो 
मेरे हृदय का भाव 
मेरे अपने हैं 
जिसे कभी अवलंबित किया था 
तुझ पर 

जबकि तुम मुझे छोड़ चुके हो 
कई साल पहले 
मेरे भावों को 
मेरे प्रेम को 
जबकि मेरा हृदय 
आज भी प्रेम से भरा है 

कभी तुझमें समर्पित था 
इसलिए तुम्हें अहसास था 

आज भी मेरी कविताओं में 
प्रेम की पुकार है 
मगर तेरा नहीं 
जिस पर अवलंबित करके 
अपमानित हो 
मेरा प्रेम 

मेरे हृदय का मूल स्वभाव 
प्रेम से रोपित है 
मगर तुम उसकी जमीन नहीं हो 

प्रेम बीज मेरे भीतर 
दबा है 
जो हृदय की गहराई में 
अंकुरित हो कर 
मुझे आनंदित करता है 

मेरा ही प्रेम 
तुम्हें सींच कर 
लहलहाए थे 

जिसे तुमने निर्थकता में फेंक दिया 
तुम्हारे पास भाव नहीं 
कोई लगाव नहीं 

बस तुम मेरी कविताओं को पढ़ कर 
कभी-कभी महसूस करते हो 
प्रेम 
जिसे अपना समझना 
नासमझी है 
तुम्हारे प्रेम का !!!!
हृदय की पुकार: प्रेम और विरह की अनकही कविताएँ



निष्कर्ष 

भावनाओं की सच्चाई


प्रेम केवल पाने का नाम नहीं है, बल्कि यह देने और समझने का भी अनुभव है। कभी-कभी, भले ही प्रेम हमारे सामने पूरी तरह स्वीकार न हो, उसकी गहराई हमारे भीतर हमेशा जीवित रहती है। यह कविता यही संदेश देती है कि भावनाएँ, यादें और प्रेम के बीज हमेशा हमारे हृदय में अंकुरित रहते हैं।
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---राजकपूर राजपूत''राज''



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