खुद को जानना ज़रूर | आत्मचिंतन और जीवन पर प्रेरक हिंदी कविता

खुद को जानना ज़रूर | आत्मचिंतन और जीवन पर प्रेरक हिंदी कविता khud-ko-janana-zaroor-hindi-kavita

मनुष्य दूसरों को समझने में जितनी रुचि लेता है, उतनी स्वयं को समझने में नहीं। दिखावे, औपचारिकताओं और दोहरे व्यवहार के बीच वास्तविक इंसान कहीं पीछे छूट जाता है। यह कविता उसी विडंबना और आत्मजागरण का संदेश देती है।

खुद को जानना ज़रूर

अपनी ज़िंदगी को जानना ज़रूर,

अंदर के इंसान को पहचानना ज़रूर।

ख़ुदा की ख़ुदाई बसती है हर सीने में,

उस लौ को नफ़रत से न जलाना ज़रूर।

घुमावदार थे उसके हर लफ़्ज़,

फिर भी वह सीधा-सादा बना ज़रूर।

संकल्प दिवस पर तस्वीरें खिंचवाना,

पर संकल्पों को भी निभाना ज़रूर।

हसीन चेहरे हर मोड़ पर मिलेंगे,

मगर नीयत को पहचानना ज़रूर।

हाथ मिलाना सबसे मुस्कुराकर,

पर भरोसा सोच-समझकर करना ज़रूर।

ऐसी ज़िंदगी में क्या रखा है, "राज",


सफ़र लंबा है—सावधान रहना ज़रूर।

जो स्वयं से जीत गया,

वही जीवन को समझ पाया ज़रूर।

दुनिया बदलने से पहले,

अपने भीतर झाँकना ज़रूर।

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और अंत में कविता 

जीवन की सबसे बड़ी यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की होती है। जो स्वयं को पहचान लेता है, वह दिखावे, छल और भ्रम से बचते हुए अधिक सजग, सरल और सार्थक जीवन जी सकता है।

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------------राजकपूर राजपूत 'राज'



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