गनपत गाँव का मशहूर किस्सागो था। लोग कहते थे—वह जितना बोलता है, उतना सच नहीं होता। चालीस–पचास साल पुरानी बातों को ऐसे सुनाता, मानो अपनी आँखों से देखा हो। फिर भी, उसकी बातों में ऐसा जादू था कि लोग खिंचे चले आते थे। खासकर बच्चे—वे तो उसके इर्द-गिर्द बैठकर घंटों उसकी कहानियाँ सुनते रहते।
एक शाम, जब सूरज ढल चुका था और अंधेरा धीरे-धीरे गाँव को घेर रहा था, गनपत ने फिर शुरू किया—
“आज से बीस साल पहले भूत बहुत होते थे… घरों के ऊपर, पेड़ों पर, मरघट के आसपास… हर जगह।”
बच्चों की आँखें फैल गईं।
“मरघट के पास जो पुराना तालाब है ना… वहाँ हर शनिवार भूतों का बाज़ार लगता था।”
“बाज़ार में क्या मिलता था?” — गोलू ने उत्सुकता से पूछा।
गनपत मुस्कुराया, फिर धीमी आवाज़ में बोला—
“मेरे दादा जी एक बार उसी तालाब के पास खेत में काम कर रहे थे। शाम को घर लौट आए, लेकिन रात को याद आया—हंसिया खेत में रह गया है।
उस समय लोग गरीब थे, हर चीज़ की कीमत जानते थे। दादा जी तुरंत उठे और गहरी रात में, बजरंग बली का नाम लेते हुए खेत की ओर चल पड़े।
मरघट के पास पहुँचे तो अजीब आवाज़ें आने लगीं—हँसी, रोना, कराहना… लेकिन वे रुके नहीं।
खेत में हंसिया नहीं मिला। तभी उन्हें एहसास हुआ—भूतों का बाज़ार लगा है।
उन्होंने अपने कपड़े उतारकर छुपा दिए, शरीर पर राख मल ली और भूतों के बीच जा मिले।
भूत डरावने थे—किसी का सिर उल्टा, किसी की आँखें लाल, किसी के मुँह से खून टपक रहा था।
बाज़ार में अजीब चीजें बिक रही थीं—हड्डियाँ, पत्थर, और इंसानी अंगों के टुकड़े।
तभी कुछ भूत ‘टेरे-टेरे’ कहते हुए नाच रहे थे। बीच में उनका हंसिया था।
दादा जी भी उनके साथ नाचने लगे। मौका मिलते ही उन्होंने हंसिया पकड़ा और भागकर घर आ गए।”
बच्चे सिमटकर बैठ गए। माहौल डर से भर गया।
तभी पास बैठे सरजू ने गनपत को रोका—
“बस भी करो! बच्चों को क्यों डराते हो? भूत-प्रेत कुछ नहीं होते।”
गनपत को यह बात चुभ गई।
“तू बहुत बहादुर बनता है? चल, आज ही साबित कर दे।”
“क्या करना होगा?” — सरजू ने चुनौती दी।
“आधी रात को मरघट जा… और वहाँ खूंटा गाड़कर आ।”
सरजू हँस पड़ा—“बस इतनी सी बात? शर्त लगी—एक हजार रुपये।”
“मंजूर है।” — गनपत बोला।
रात गहरा चुकी थी।
बारह बजे, सरजू एक लकड़ी का खूंटा और औजार लेकर निकला। गलियाँ सूनी थीं, कुत्तों की भौंक और हवा की सरसराहट उसके डर को बढ़ा रही थी।
वह खुद को समझाता—“भूत कुछ नहीं होते…”
लेकिन हर आवाज़ उसे चौंका देती।
आखिरकार वह मरघट पहुँचा। दिल तेजी से धड़क रहा था। उसने जल्दी-जल्दी खूंटा गाड़ना शुरू किया।
डर के कारण उसने अपनी धोती कसकर बाँध ली।
खूंटा गाड़कर जैसे ही मुड़ा—
उसे लगा, कोई पीछे से उसकी धोती खींच रहा है।
उसका खून सूख गया।
“क…कौन है…?” — उसकी आवाज काँप गई।
उसने जोर से खींचा, लेकिन धोती नहीं छूटी।
अब उसे यकीन हो गया—भूत ने पकड़ लिया है।
डर ने उसकी सोचने की शक्ति छीन ली।
वह जमीन पर गिर पड़ा, चीखने लगा—
“बचाओ… बचाओ…!”
लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
कुछ ही पल में उसकी आवाज़ थम गई… और साँसें भी।
सुबह, जब गनपत वहाँ पहुँचा, तो भीड़ लगी थी।
सरजू जमीन पर पड़ा था—आँखें खुली, चेहरा भय से जकड़ा हुआ।
सच्चाई सामने थी—
खूंटा गाड़ते समय उसकी धोती उसी में फँस गई थी।
जिसे वह भूत समझ बैठा… वही उसकी मौत का कारण बन गया।
गनपत वहीं बैठ गया, सिर पकड़कर।
अब उसके पास कहने को कोई कहानी नहीं थी।
अंतिम संदेश:
डर बाहर नहीं होता… वह हमारे अंदर होता है।
और जब अंधविश्वास उसे हवा देता है, तो इंसान खुद ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है।
इन्हें भी पढ़ें 👉 एक किसान की कहानी हिंदी में
.....................................................................
--- राजकपूर राजपूत ''राज"
0 टिप्पणियाँ