अब के लोग किस तरह जीते हैं | आधुनिक जीवन और प्रेम पर ग़ज़ल zindagi ki tarah ghazal
समय के साथ जीवन के तौर-तरीके बदलते हैं, लेकिन मनुष्य की मूल भावनाएँ—प्रेम, विश्वास, संवेदना और सत्य की खोज—आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। प्रस्तुत ग़ज़ल आधुनिक जीवन की उलझनों, बदलते रिश्तों, विचारों के टकराव और प्रेम की कठिन राह पर एक चिंतन है। इसमें कवि वर्तमान समय के कुछ विरोधाभासों को प्रश्नों के माध्यम से सामने लाने का प्रयास करता है।
अब के लोग गजल
अब के लोग ये चलते हैं किस तरह,
ज़िंदगी को जीते नहीं ज़िंदगी की तरह।
रिश्तों की परिभाषाएँ बदली हैं ज़माने में,
ना जाने विष पी गई मीरा किस तरह।
फ़र्क़ हैं दुनिया भर से उसमें कई बातें,
जिसके सीने में झूठ हो ईमान की तरह।
दिल का ख़याल अलग हो सकता है मगर,
ज़िद करें कि आदमी न हो आदमी की तरह।
दिमाग़ से जलते हुए, दिल से बुझते हुए,
उड़ रहे हैं धुएँ बुझे हुए दीपक की तरह।
कठिन मानते हैं आजकल इश्क़ को "राज",
जबकि वह मनमाफ़िक नहीं लैला-मजनूँ की तरह।
शब्दों की आज़ादी का मान रखना अच्छा है,
पर प्रश्न भी हों विवेक और सम्मान की तरह।
ज्ञान तभी सार्थक है जब विनम्रता साथ रहे,
वरना शोर रह जाता है केवल बयान की तरह।
और अंत में गजल
जीवन केवल विचारों से नहीं, बल्कि व्यवहार, संवेदना और संतुलन से भी बनता है। प्रेम, सत्य और मानवीयता आज भी उतने ही आवश्यक हैं जितने पहले थे। बदलते समय में इन्हें बचाए रखना ही सबसे बड़ी चुनौती है।
जिसकी अहमियत है बस बोलने की आजादी में
वो भगवान के अस्तित्व पर सवाल उठाए, ज्ञानचंद की तरह
शोषित पीड़ित हूं लेकिन बोलता हूं हिन्दुओं पर
ज्ञानचंद का तमगा मिला है सियासी पंथों की तरह !!!
-----राजकपूर राजपूत "राज"

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