हम ये किस मोड़ पर खड़े हो गए | बदलते रिश्ते, आधुनिक जीवन और संवेदनाओं पर कविता
आधुनिक जीवन ने मनुष्य को सुविधाएँ तो दी हैं, लेकिन कई बार वही सुविधाएँ उसे अपने रिश्तों, प्रकृति और संवेदनाओं से दूर भी ले जाती हैं। गाँव की चौपाल, आँगन की गौरैया, तुलसी का पौधा और परिवार का साथ—ये सब धीरे-धीरे स्मृतियों का हिस्सा बनते जा रहे हैं। प्रस्तुत कविता बदलते समय, बिखरते रिश्तों और सामाजिक व्यवहार की विडंबनाओं पर एक संवेदनशील दृष्टि प्रस्तुत करती है।
हम ये किस मोड़ पर खड़े हो गए
हम ये किस मोड़ पर खड़े हो गए,
जहाँ गए हम, वहाँ अकेले हो गए।
पत्ते-पत्ते में कोमलता की छाँव थी,
देखो, बेमौसम ही पतझड़ हो गए।
गौरैया की चीं-चीं से गूँजता था घर-आँगन,
अब सन्नाटा है, न जाने वे कहाँ चले गए।
खिड़कियाँ हैं, दरवाज़े हैं, मकान भी हैं,
पर घर के भीतर घर जैसे एहसास खो गए।
तरस गई बूढ़ी आँखें औलाद की राह में,
वक्त की दौड़ में सब परदेशी हो गए।
सपनों की तलाश में निकले थे जो,
अपनों से ही दूर होते चले गए।
ऐसा नहीं, ख़ुदा, कि मैं तुम्हें भूल गया,
कुछ मजबूर थे, कुछ बेवजह दूर हो गए !!!!
कंक्रीट की मज़बूत दीवारें खड़ी हैं,
घर की तुलसी एक कोने में रह गई
आँगन तो बड़ा होता चला गया,
पर अपनापन कहीं खोता गया
वह बच्चा था, मां कुछ पल ओझल क्या हुई
दिन भर रोता गया !!!!
आधुनिक जीवन पर कविता
रिश्ते वहीं टूटे
रिश्ते वहीं टूटे,
जहाँ मतलब फूटे।
स्वार्थ जब बीच में आ जाता है,
तो अपनापन धीरे-धीरे छूटे।
कार से उतरकर जब सब्ज़ी लेने गए,
दो पैसे कम कराने में बहस कर गए
वहीं बड़ी दुकानों में पहुँचकर,
बिना सवाल किए दाम भर गए
अपनी-अपनी समझ की बात थी,
सब खुद को समझदार कह गए
लेकिन व्यवहार की कसौटी पर,
कई चेहरे अधूरे रह गए
पहुँच बताकर, विश्वास जताकर,
गरीबों के सामने कॉलर ऊँची कर गए
जहाँ मिले रसूखदार लोग,
वहीं सिर झुकाकर खड़े हो गए !!!!
सम्मान का माप धन नहीं होता,
न पद और पहचान से इंसान बड़ा होता है।
जो हर व्यक्ति के साथ समान व्यवहार करे,
वही सच में बड़ा होता है !!!!!
और अंत में कविता
समय बदलना स्वाभाविक है, लेकिन यदि विकास के साथ संवेदनाएँ खो जाएँ, तो जीवन अधूरा हो जाता है। रिश्ते स्वार्थ से नहीं, विश्वास से चलते हैं। और घर केवल दीवारों से नहीं, बल्कि प्रेम, सम्मान और अपनत्व से बनता है।
यह कविता आधुनिक जीवन की उस विडंबना को सामने लाती है, जहाँ भौतिक प्रगति के साथ भावनात्मक दूरी भी बढ़ती जा रही है। रिश्तों की गर्माहट, बुज़ुर्गों का स्नेह, प्रकृति का साथ और समान व्यवहार—यही जीवन की वास्तविक संपत्ति हैं।
-राजकपूर राजपूत "राज "
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2 टिप्पणियाँ
तबाही
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर रचना 👌👌
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