प्रेम और सियासत – दिल की बातों की कविता prem-siyasat-rishton-ka-safar
- आज कल के लोग खुद को इतना समझदार मानते हैं कि वह स्व घोषित बुद्धिजीवी हैं । जिसे समझा नहीं सकते हैं । जब भी दिल की बातें करो । अपना ज्ञान जरूर दें देते हैं । जहां भावनात्मक बातों की जरूरत होती है वहां दिमाग की लॉजिक करते हैं । दिल की सुनने वाले यहां कोई नहीं है । ऐसे लोगों को किसी भावना से कोई मतलब नहीं है । वो हर जगह अपना दिमाग चलाने की कोशिश करते हैं । इस पर कविता हिन्दी 👇
प्रेम और सियासत – दिल की बातों की कविता
कहे अपने दिल की बात,
हम किस तरह
समझें खुद को होशियार समझाए, किस तरह।
उन्हें सवाल पर भरोसा था,
जवाब पर नहीं,
जिरह में रिश्ते उड़ रहे हैं,
पत्तों की तरह।
अपने ही गम से निजात पा लेते तो अच्छा था,
दुनिया की चिंता थी,
किसी फ़रिश्ते की तरह।
नज़रों को ही समझने में,
मुझसे भूल हुई भारी,
देख रहे थे वो मुझे
किसी व्यापारी की तरह।
शिक़ायत उसे भी है,
जमाने की रिश्वतखोरी से,
लेते हैं रिश्वत अपनों से,
चाय-पानी की तरह।
इश्क और सियासत में
सब जायज़ मान बैठे,
पैर जमाने खड़े हैं
लंका में अंगद की तरह।
लड़ते रहते कब तक,
बुढ़े अपने बेटों-बहुओं से,
कोने में पड़े हैं
आजकल किसी बेगानों की तरह!
प्रेम में सबकुछ मिला,
प्रेम में सबकुछ सहा,
मगर किसी को समझा न सका।
मौन की अभिव्यक्ति में फंसा प्रेम,
हार गया हर जगह,
जब दलीलें पेश की,
तो सबूत न दे सका।
अपनी ही भावनाओं की प्रस्तुति,
व्यवहार से झलकती थी।
प्रेम में तड़पा तो
उसने सहानुभूति दी,
“मेरा प्रेम कितना बेचारा है”,
उसने इस तरह फांसी दी।
🔹 संदेश और विचार
प्रेम और सियासत में विश्वास और समझ की कमी
अक्सर रिश्तों को कमजोर कर देती है।
मौन और संवेदनशीलता का सही मूल्य
सिर्फ़ वही समझ पाएगा, जिसने अनुभव किया हो।
समाज में रिश्वत, स्वार्थ और चालाकी
भावनाओं की सच्चाई को दबा देते हैं।
_राजकपूर राजपूत "राज"
2 टिप्पणियाँ
बहुत अच्छा पर कई शब्द हमें समझ में नहीं आता जैसे कि जिरह
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर
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