संस्कार, संस्कृति और शिक्षित समाज की सच्चाई लेख
तमीज़ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आज के समय में एक महत्वपूर्ण विषय बन चुका है। हर व्यक्ति अपनी बात रखने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन क्या हम इस स्वतंत्रता का सही उपयोग कर रहे हैं? यह प्रश्न आज के शिक्षित समाज की पहचान पर सीधा प्रभाव डालता है।
आज के दौर में कई लोग स्वयं को विचारक और बुद्धिजीवी बताते हैं। वे लगातार बोलते और लिखते रहते हैं, मानो यही उनकी विद्वता का प्रमाण हो। लेकिन सच्चाई यह है कि केवल बोलना ही ज्ञान नहीं होता। तमीज़ और समझ, दोनों का होना उतना ही आवश्यक है।
तमीज़ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
संस्कृति और संस्कार किसी भी समाज की नींव होते हैं। आज कुछ लोग इन्हें पुराना और बेकार बताकर छोड़ने की सलाह देते हैं। वे अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर मर्यादा को तोड़ने का प्रयास करते हैं। लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि बिना मर्यादा के स्वतंत्रता, अराजकता में बदल जाती है।
हर व्यक्ति को अपने विचार रखने का अधिकार है, लेकिन जब यह अधिकार जिम्मेदारी के बिना प्रयोग किया जाता है, तब वह समाज को नुकसान पहुंचाता है। आज के कई तथाकथित विचारक लोगों को भ्रमित कर रहे हैं। वे परंपराओं को अंधविश्वास बताकर समाज को उसकी जड़ों से दूर कर रहे हैं।
वास्तव में, इस देश का सबसे बड़ा अंधविश्वास यह बनता जा रहा है कि जो अधिक बोलता है, वही अधिक ज्ञानी है। जबकि सच्चा ज्ञान वह है, जो संस्कार, संस्कृति और मर्यादा के साथ व्यक्त किया जाए।
एक सच्चे शिक्षित समाज की पहचान यही होती है कि वह अपने मूल्यों को बनाए रखते हुए आगे बढ़े। जो समाज अपनी जड़ों को भूल जाता है, वह कभी स्थायी प्रगति नहीं कर सकता।
अंत में, यह समझना आवश्यक है कि तमीज़ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। यदि हम एक बेहतर समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें संस्कार, संस्कृति और मर्यादा को अपनाते हुए अपनी बात रखनी होगी।
लिख पाया वहीं
अपनी बिरादरी की तकलीफें
जिसने अपनी बिरादरी बस पहचाना है
कितना संकुचित है विचारधारा
बाक़ी बिरादरी की तकलीफें से अनजाना है !!!!
इन्हें भी पढ़ें बौद्धिक गुलामी

0 टिप्पणियाँ