अहंकार का स्वरूप, हमारा ज्ञान ego-of-form-our-knowledge-poetry-literature-life

ego-of-form-our-knowledge-poetry-literature-life अहंकार में आदमी अपने सिवा कुछ भी नहीं देखता है । न अपनी गलतियों को पहचानता है न ही किसी अन्य को स्वीकारता है । वह खुद गलती करेगा लेकिन उसे दूसरों पर फोड़ते हैं । अपने आप को सबसे सर्वश्रेष्ठ साबित का भाव, उसे मुर्खतापूर्ण कार्य की ओर प्रेरित करने लगते हैं । अपने इस स्वभाव को सही मानते हैं । न किसी का सुनता है और न ही किसी के बातों को स्वीकारते हैं । इसी वजह से उसे अन्य लोग दूरी बनाने लगते हैं । न कोई उसे सलाह दे सकते हैं न ही उसको समझाने की कोशिश करते हैं । पढ़िए इसी विषय पर कविता 👇

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 विष विषाद आवरण तना
सच सुनना साफ़ साफ़ मना
बैठ न पाए किसी के तीर में
स्वयं के सिवाय न पीर में
ऐसा लगता है सब जान गए
अहंकार ही को ज्ञान मान गए
न सुनने का धैर्य किसी में
अपने तर्क के अभिमान सभी में
न ख़ोज हुए कभी सत्य की
बहस चलती है यहां कब की
तुलनात्मक तर्क कोई न्याय नहीं
खुद को साबित करना मान सही
जीने का उद्देश्य यही है
अपनी सुविधा ही सही है
अब नहीं स्थापित होगा कोई
अब सच बोलेंगे नहीं यहां कोई
हित साधना सब जान गए
मतलब निकालना मान गए
बाकी ज्ञान अधूरा है
व्यक्तिवादी जीवन पूरा है !!!

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तर्क के नाम पर फर्क करने वाले, 
भावना ही भगवान है
 कुछ चीजें विश्वास पे टिके हुए हैं 
 कुछ लोग हर जगह ज्ञान देते हैं ।श
 वहीं मुर्ख रिश्तों में असंतुलन पैदा करते हैं ।!!!

जानता हूं कहके अभिमान हो गया
कुछ तर्को से उसे ज्ञान हो गया
मुर्ख अभी जानता नहीं
खुद का घर सम्हालता नहीं
गैरों को समझाकर सियान हो गया
सबको तोड़ूंगा ऐसा अभियान हो गया
जिसे कुछ तर्कों से ज्ञान हो गया  !!!!
          -राजकपूर राजपूत 
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