दुनिया की नज़र - कविता
आज की दुनिया में लोग खुद को साबित करने की होड़ में लगे हैं। ज्ञान, तर्क और शब्दों के सहारे अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन क्या यही सच्ची श्रेष्ठता है? यह कविता इसी सवाल को गहराई से उठाती है।
📖 सिद्ध करना है तुम्हें (कविता)
सिद्ध करना है तुम्हें
खुद को,
जो साबित नहीं है
लोगों के बीच में—
तुम्हारा स्तर
समझने का।
इसलिए बातें करते हो
विद्वतापूर्ण,
जैसे जानकार हो
दुनिया के।
अपने तर्कों और जिरह से
बहला तो सकते हो
दुनिया को,
जिससे तुम्हारी प्रमाणिकता
सिद्ध हो जाए,
लेकिन अहसास नहीं दे सकते
किसी को—
बेहतर,
जिसे जिया जाए
ज़िंदगी भर।
उपयोगिता के आधार पर
लाभ-हानि में बाँट देते हो
रिश्तों को—
जब तक फायदा है,
लेते रहते हो
रिश्तों का;
वरना कहीं और
तलाश होती है
फायदे की।
जिसमें जो सिद्धहस्त होते हैं,
वही प्रमाणित होते हैं
दुनिया की नज़रों में;
जो हार जाते हैं,
वे उपेक्षित।
हालाँकि दुनिया
धन-दौलत से आँकती है,
उसी के आगे झुकती है;
मगर भीड़ के कहने से
कोई प्रमाणित
नहीं हो जाता।
बेहतर तो वह अहसास है
जो दिल में होता है,
जिसमें आदमी
सोता भी है, जागता भी है;
जिसे बाहरी दुनिया
आँक नहीं सकती,
तुम्हारी विद्वत्ता
झाँक नहीं सकती
किसी के जीने के
अंदाज़ को।
🔍 कविता का भावार्थ
यह कविता बताती है कि केवल ज्ञान और तर्क से व्यक्ति महान नहीं बनता। सच्ची श्रेष्ठता उस अहसास में होती है, जो दिल से महसूस किया जाए और जीवन में जिया जाए।
⚖️ दिखावा बनाम सच्चाई
आज लोग रिश्तों को भी लाभ-हानि के तराजू में तौलते हैं। लेकिन सच्चे रिश्ते और भावनाएँ किसी गणना या तर्क से परे होती हैं।
💡 जीवन का संदेश
भीड़, धन और दिखावे से नहीं—बल्कि सच्चे अहसास और इंसानियत से ही व्यक्ति की असली पहचान बनती है।
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