विरोध और आत्मचिंतन | आलोचना, विचार और आत्मसम्मान पर हिंदी कविता /poetry protest on hindi
जीवन में हर व्यक्ति को आलोचना का सामना करना पड़ता है। कुछ आलोचनाएँ हमें बेहतर बनाती हैं, तो कुछ केवल मनोबल गिराने का प्रयास करती हैं। परंतु सच्ची परिपक्वता इसी में है कि हम हर विरोध में भी सत्य खोजने का प्रयास करें। यह कविता उसी मानसिक संघर्ष, आत्मचिंतन और अपने मूल्यों पर अडिग रहने की संवेदना को व्यक्त करती है।
विरोध पर कविता
वह मेरा विरोध करता है,
मुखर होकर।
मेरी गलतियों की ओर
बार-बार इशारा करता है।
कहता है—
"तुम गलत हो।"
और मैं,
हर बार
उसके शब्दों में
अपने लिए
थोड़ा-सा स्नेह,
थोड़ी-सी सद्भावना
ढूँढ़ने की कोशिश करता हूँ।
लेकिन शायद
वह देने के लिए
तैयार नहीं है।
उसकी दृष्टि में
कटुता अधिक है,
करुणा कम।
उसकी हँसी में
व्यंग्य का स्वर है,
मानो वह
मुझे समझाना नहीं,
मेरा मनोबल तोड़ना चाहता हो।
कभी-कभी लगता है,
वह मुझे बदलना चाहता है—
अपने अनुरूप,
अपने विचारों के अनुसार।
और मैं
शांत होकर
उसके भीतर भी
झाँकने का प्रयास करता हूँ।
वहाँ मुझे भी
कुछ अधूरापन दिखाई देता है,
कुछ ऐसी इच्छाएँ,
जो सुविधा के रास्ते
जल्दी पूरी होना चाहती हैं।
शायद इसलिए
हमारे रास्ते अलग हैं।
उसके लिए
सुविधा ही सत्य है,
और मेरे लिए
सत्य,
सुविधा से बड़ा।
मैं यह नहीं कहता
कि मैं पूर्ण हूँ।
मैं भी गलत हो सकता हूँ।
पर मैं इतना अवश्य चाहता हूँ
कि मेरी भूलों की ओर
उँगली उठाने वाला
मुझे गिराने के बजाय
संभालने का प्रयास करे।
क्योंकि आलोचना का उद्देश्य
यदि सुधार नहीं,
केवल अपमान रह जाए,
तो वह संवाद नहीं,
दूरी पैदा करती है।
और जहाँ संवाद समाप्त हो जाता है,
वहाँ संबंध भी
धीरे-धीरे मौन हो जाते हैं।
और अंत में कविता
विरोध जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। सच्चा विरोध वही है जो व्यक्ति को बेहतर बनने की प्रेरणा दे। यदि आलोचना में करुणा, सम्मान और सुधार की भावना हो, तो वह विकास का माध्यम बनती है; अन्यथा केवल कटुता छोड़ जाती है।
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