भूख और भीड़ — समाज पर विचार करती हिंदी कविता hungry-on-ghazal-in-hindi
भूख केवल पेट की तृप्ति नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और मानवीय दृष्टिकोण का प्रतीक भी है। यह कविता दिखाती है कि कैसे भूखा व्यक्ति अपने संघर्ष में इंसानियत और भीड़ की चुनौती दोनों से जूझता है। भीड़ उसे बहला-फुसलाकर कैसे उपयोग करती है । भीड़ के प्रभाव में आ कर भूख का अर्थ भूल जाता है ।
भूख और भीड़ (कविता)
भूख क्या होती है,
रोज़ तलाश होती है।
एक-एक दाने की,
चिड़िया की तलाश होती है।
सुबह हुई और उड़ चली,
दाने की तलाश में।
शाम हुई और लौट चली,
घोंसले की उड़ान में।
एक-एक दाना बाँट दिए,
अपनों की प्यास बुझाई।
दिनभर की थकान मिट गई,
देख अपनों की खुशी हुई।
दिल में अरमान सजाए, सो गई,
फिर सुबह नई तलाश होती है।
भीड़ के तंत्र ने, कविता
भूखा व्यक्ति को भी
भूख की ललक मार दी है।
वह काम के बदले
पत्थर फेंक रहा है।
चंद पैसों के खातिर,
स्थाई भूख को पहचान नहीं पाया।
बड़ी जिम्मेदारी से
सिर फोड़ा और भाग गया।
भीड़ ने बचाव में,
उसको बधाई देने में,
ज़रा भी देर नहीं की।
भूखा व्यक्ति अब खुश है।
कुछ लोगों ने,
भूखा व्यक्ति नहीं देखा,
सुविधा देखी।
पैसों के खातिर,
बन गए शातिर।
मौका ढूंढकर,
शिकार करते हैं
भूखा व्यक्ति का।
पत्थर उठाकर
फेंकना शुरू किया।
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कविता का अर्थ
यह कविता भूख, इंसानियत और सामाजिक नकारात्मकताओं को उजागर करती है। यह दिखाती है कि कैसे समाज और भीड़ कभी-कभी असहाय व्यक्ति की पीड़ा को अनदेखा कर देते हैं और अवसरवादिता का फायदा उठाते हैं।
जीवन और समाज का संदेश
भूख केवल शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक अनुभव भी है।
इंसानियत और संवेदनशीलता हमेशा अवसरवादिता के खिलाफ खड़ी होती है।
समाज को अपनी जिम्मेदारी और संवेदनशीलता समझकर कार्य करना चाहिए।
-राजकपूर राजपूत राज

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