धूप, ओस और हरियाली – प्रकृति का सुन्दर खेल कविता dhoop-or-hariyali-prakriti-kavita
प्रकृति की सरल लेकिन गहन सुंदरता में जीवन की एक अनोखी शांति छिपी होती है। यह कविता हमें उस अनुभव में ले जाती है, जब सुबह की धूप, ओस की बूंदें, हरियाली और खिलते फूल हमारे मन को सुकून और ताजगी का एहसास कराते हैं। छोटे-छोटे दृश्य—मोर का नाच, बच्चों की हँसी, पेड़ों की हरियाली—सभी जीवन की सरल खुशियों का प्रतीक हैं।
कविता- ओस की बूंदें
धूप उतरती है पेड़ों से,
धीरे-धीरे,
लड़ जाती है अंधियारों से,
धीरे-धीरे।
सूरज की किरणों से
शरमा कर सरक गईं,
ओस की बूंदें।
हरी-हरी दूबों से
न जाने क्या कह गईं,
सूरज की किरणें
और मिल गईं ओस
अपनी ज़मीं से।
प्रकृति की सुंदरता कविता
सूरज के रहते
बादल नहीं शर्माए,
दिन भर की धूप से
नहीं थर्राए।
धूप खिली रही,
वर्षा होती रही।
हरियाली छा रही है
पेड़ के पत्तों में चिपकी धूल
झर गई है,
रंगत बढ़ गई।
अधखिले फूल
खिल उठे हैं,
मोर नाच उठे,
बच्चे खिलखिला उठे।
नौतपा के बाद बरसे बदरा,
सबकी प्यास बुझा दी।
-राजकपूर राजपूत "राज "
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