आज अच्छा, कल बुरा – समय, इंसान और समाज की सच्चाई aaj-achha-kal-bura-hindi-kavita
समय, इंसान और समाज के नजरिए अक्सर बदलते रहते हैं। आज जिसे सही मानते हैं, कल वही गलत लग सकता है। यह कविता उन अनुभवों और वास्तविकताओं को बयां करती है, जहां परंपरा, सोच और व्यस्त जीवन हमें सच्चाई को पहचानने से रोकते हैं।
इंसान की सोच कविता
ये आज अच्छा, ये कल बुरा है,
कह दो, कोई दिल की बात कहे तो बुरा है।
मौसम का मिज़ाज था या आदमी का,
तबीयत खराब हो तो मौसम बुरा है।
वो आदमी भले मानुष था अब तक,
चुप था, जब मुँह खोला तो बुरा है।
उसे मनमाफिक बातें ही अच्छी लगती हैं,
मीठा-मीठा गप-गप, कड़वा हो तो बुरा है।
वो नजरअंदाज करके महान बने हैं,
सच के लिए खड़ा हो कह दो तो बुरा है।
कोई साथ देगा मेरे सफर में "राज",
अकेले ही अच्छा है, किसी की उम्मीद बुरा है।
समय का मिज़ाज कविता
तुमने देखा नहीं होगा,
परंपरा बनती और बिगड़ती है।
कल मौन ज्ञानी होने का प्रमाण था,
वहीं जो बोलना सीख गए हैं,
आज शिक्षित माने जाने लगे हैं।
नेताओं के भाषणों के पीछे चलते लोग,
इस बात की प्रमाणिकता हैं।
लोगों ने सोचना कम कर दिया,
या व्यस्त हैं अपने जीवन में।
यदि देखकर, बोलने वाले लोगों ने ध्यान आकर्षित किया,
और व्यस्त लोग व्यस्तता में सही मान लिए,
तो बोलने वाले लोगों ने सोशल मीडिया पर बोले,
भ्रामक, असत्यता का प्रचार किया।
तर्कों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया गया,
फर्क उसका दिखाई दिया, लेकिन हम व्यस्त रहे,
और वही ज्ञानी बन गए।
"राम " मज़ाक उड़ानें वाले
"राम " का आदर्श कहां जानने वाले
चलेंगे सुविधा में
कष्ट कहां उठाने वाले !!!!
-राजकपूर राजपूत "राज "
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