साल भर में एक बार तीज – बेटियों का मायके और ससुराल Ghazal on Teej festiva

साल भर में एक बार तीज – बेटियों का मायके और ससुराल Ghazal on Teej festiva

तीज का त्यौहार सिर्फ धार्मिक महत्व नहीं रखता, बल्कि बेटियों के लिए मायके और परिवार के रिश्तों की यादें भी लेकर आता है। यह कविता उन्हीं भावनाओं और अनुभवों को व्यक्त करती है, जब बेटी साल भर में एक बार मायके आती है, अपनी बचपन की गलियों को याद करती है और ससुराल की नई दुनिया का सामना करती है।

कविता:साल भर में एक बार तीज पर


साल भर में एक बार तीज पर,

बेटियां आती हैं मायके लीज़ पर।

शर्त है पति का रहना है दो-तीन दिन,

फिर भी आती हैं मायके इसी सीज पर।

खुशी से कदम मचलते हैं मायके की,

भूले-बिसरे बातें होती हैं हर चीज़ पर।

दबी भावनाएं मचलने लगती हैं,

सबसे मिलकर आज भी ताजगी है,

रिश्तों के हर बीज पर।

रहती हैं व्रत पति की लंबी उम्र के लिए,

निर्जला व्रत, खाना-पीना सब फ्रीज पर।

सारे नियम और शर्तें हैं हर औरत की मगर,

पुरूष जीता है अपनी मर्जी और निज पर।

बेगाना हो जाना कविता 

कितना बेगाना हो जाता है

दहलीज़ पार होते ही।

बचपन गुजरी उन गलियों में अब अनजाना है,

ससुराल आते ही न मायके अपना, न ससुराल अपना।

कहाँ ठिकाना है, थोड़ा सा झगड़ा होते ही,

अनजान लोग अपना लगने लगते हैं।

पहचान जो थी बचपन की, अब सपना है,

मिलते हैं वे लोग जो कभी अपने थे।

मिलने की चाहत रहती है अक्सर थोड़ी सी,

कितना बेगाना हो जाता है

दहलीज़ पार होते ही।

-राजकपूर राजपूत "राज "

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Ghazal on Teej festiva



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