इंसानियत और सियासत – हिंदी कविता Humanity and Politics – Hindi Poem
कभी-कभी जीवन और रिश्तों की वास्तविकता हमारे सामने वैसी नहीं होती जैसी हमें दिखती है।
यह कविता बताती है कि सियासत, समाज और अवसरवादी सोच कैसे इंसानियत और प्रेम के वास्तविक भावों को प्रभावित करते हैं।
✨ कविता: इंसानियत और सियासत ✨
कहानी कुछ और थी,
जुबान कुछ और थी।
सियासत में छुप गया चेहरा,
सीरत कुछ और थी।
हाथ मिलाया, दिल नहीं,
मोहब्बत कुछ और थी।
बारूद के ढेर में बैठा हुआ,
इंसानियत कुछ और थी।
मुझे पैसों से तौलते हैं सभी,
मेरी दुनिया कुछ और थी! 💔
संबंधों को छोड़कर,
घर के एक कोने में बैठ कर
मोबाइल चलाते पति,
पत्नी को सुंदर लगने लगा।
उसकी इच्छा यह नहीं थी,
लेकिन फिर भी सुकून मिलता था।
जितने बाहरी रिश्ते-नाते हैं,
बस अवसर ढूंढते हैं।
बातें चाहें कुछ भी करें,
अकेले रहना सुरक्षित मानी उसने।
मतलब निकालने में अभ्यस्त दुनिया,
पास जाने से,
किसी का अवसर बनने से
डर जाती है! ⚡
लोगों को खुशी हो रही है,
वे शिक्षित हो गए हैं।
शिक्षित क्या, चालाक हो गए हैं।
संबंधों में सावधानी,
मतलब के प्रति सचेत।
एक दूसरे को डरा रहे हैं! 🌿
सीरत कुछ भी हो,
इंसान कोई भी हो,
इतना पक्का है—
अक्सर मिलते ही
मतलब निकालने से चुकते नहीं हैं,
चाहें कोई भी हो! 💔
🌟 और अंत में कविता 🌟
यह कविता यह संदेश देती है कि सियासत, अवसरवादी सोच और बाहरी दिखावा अक्सर इंसानियत और प्रेम के असली भावों को छुपा देते हैं।
सच्चे रिश्ते और प्रेम वही हैं, जो मन और भावना से जुड़ें, बिना किसी मतलब या अवसर की खोज के।
समाज में सतर्क रहना और सच्चाई की पहचान करना ही असली सीख है।
-राजकपूर राजपूत
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