दिल और दिमाग कविता हिन्दी dil-ur-dimag-kavita-hindi

दिल और दिमाग कविता हिन्दी dil-ur-dimag-kavita-hindi

देश और दुनिया - उस दौर का नहीं रहा, जहां नैतिकता, चरित्र, सभ्यता सबको पसंद थी । आजकल सफलता चाहिए । हर हाल में । चाहे जैसे भी हो । पृथ्वीराज चौहान ने सत्रह बार जीवन दान देने के बाद भी धोखा खाया । लोग आज उस कायर को महान कहने लगे हैं क्योंकि सफल हुआ आदमी ही को याद रखा जाता है । हमारे देश में कलयुग का प्रारंभ इसी दिन से शुरू हुआ है । गलत परिभाषा, तरीके को सही साबित करते रहे हैं । आज तो ऐसे ही दोगले लोग सभ्यता और महानता का मुखौटा पहन कर रखे हैं । पढ़िए इस असभ्य लोगों की सभ्यता पर कविता 👇 

दिल और दिमाग कविता 

दिल इंसान का सबसे खूबसूरत हिस्सा है
लेकिन दिमाग की चाल में सब किस्सा है!!!

चालाकी ही तोड़ दिया सबको वर्ना
आज भी मजा था जीने का, मरने का !!!

वो सोचता है दुनिया बदल दुंगी
जज़्बात खत्म तो क्या मतलब है फिर जीने का

न जाने कब से चालाकी को विज्ञान मान बैठे
हमने देखा है उसकी मुर्खता बेहिसाब का 

कितनी भी चालाकी और सियासत कर लो
आखिर उतरेगा चेहरा नकाब का !!!
 

वो समझ बैठे हैं जमाने को गवार
हमने देखा है उसमें जमाने भर का गवार !!


मैं उनके समकक्ष था 

मेरे विचार उनसे मिलते थे 
सच का आह्वान उसने भी किया 
मैंने भी किया 
अच्छे कर्म 
व्यक्ति की स्वतंत्रता 
लगभग समान मांग थी 

इस तरह में मुखर हो गया 
अपनों के बीच में 
विरोध किया 
हर उस चीज़ का 
जो मेरे जीवन की स्वतंत्रता और परिभाषा से भिन्न थे 
उसने मेरा समर्थन किया 
मुझे लगा ये मेरा अपना है 
और मैं अपनों में बुराई देखने लगा 

अब मैं कट चुका था 
अपनों से 
मैं जुड़ चुका था दुश्मनों से 
जिसने कभी अपनी बुराई नहीं ढूंढी 
ढूंढी तो केवल मुझमें 
उसने बुराई भी सभ्यता के साथ पेश किया 
हकीकत लगा 
क्योंकि मेरे देखने का तरीका 
उसकी थी 

मैं मर चुका था 
विचार से, 
जीवन से 
क्योंकि मेरा दुश्मन ही 
मुझे हांक चुका था 
फास चुका था
तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग !!!!

-राजकपूर राजपूत "राज "
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