पत्थर में भगवान | आस्था, भक्ति और मानवता पर गहन हिंदी कविता patthar mein bhagwan-hindi-kavita
मनुष्य और ईश्वर का संबंध जितना पुराना है, उतना ही जटिल भी है। जब जीवन में सब कुछ अनुकूल होता है, तब मनुष्य अपनी सफलता का श्रेय स्वयं को देता है; और जब कठिनाइयाँ घेर लेती हैं, तब उसकी दृष्टि ईश्वर की ओर उठती है। यह स्वाभाविक मानवीय प्रवृत्ति है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हमारी आस्था केवल इच्छाओं की पूर्ति तक सीमित है, या वह जीवन जीने का एक मूल्य भी है? यदि भक्ति केवल माँगने का माध्यम बन जाए और कृतज्ञता का भाव खो जाए, तो पूजा केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाती है। यह कविता उसी आत्मचिंतन की ओर संकेत करती है।
पत्थर में भगवान
जब इंसान हार जाते हैं
भगवान के पास जाते हैं
सारे संसार से प्यार न मिला
भगवान के गुणगान गाते हैं
उसकी स्तुति ही समर्पण है
घुटनों के बल झुक जाते हैं
आदमी कामनाओं में हो तो
श्रीफल यूॅं ही फोड़ जाते हैं
मिल जाए यदि मोहमाया तो
भगवान को भूल जाते हैं
ऐसे स्वार्थी इंसानों के लिए
भगवान पत्थर हो जाते हैं !!!
पत्थर में भगवान होते हैं
बस इंसान इंसान नहीं होते हैं
एक कामना जागी, उसने प्रार्थना की
मिली तो ठीक वरना नफ़रत की
बनाएं है जिसने सृष्टि को तो सभी समान है
व्यक्ति, स्वयं के लिए जीएं ऐसे में कहां भगवान है !!!!
और अंत में कविता
ईश्वर में विश्वास तभी सार्थक है, जब वह हमारे व्यवहार में भी दिखाई दे। यदि पूजा के बाद भी हमारे भीतर घृणा, अहंकार, भेदभाव और स्वार्थ बना रहे, तो हमारी प्रार्थना अधूरी है। सच्ची आस्था वह है जो मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक करुणामय और अधिक न्यायपूर्ण बनाए। मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर या गुरुद्वारा श्रद्धा के केंद्र हो सकते हैं, लेकिन ईश्वर का सबसे जीवंत मंदिर मनुष्य का हृदय है। जिस दिन हम हर व्यक्ति में सम्मान, करुणा और समानता का भाव देखना सीख जाएंगे, उसी दिन हमारी पूजा केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जीवन का सत्य बन जाएगी।
इन्हें भी पढ़ें 👉 योग का महत्व
---राजकपूर राजपूत''राज''
0 टिप्पणियाँ