कविता: सच्चाई आदमी की sachchai-aadmi-ki kavita

कविता: सच्चाई आदमी की sachchai-aadmi-ki kavita 

यह कविता में इंसान की अच्छाई और बुराई, समाज और प्रकृति के साथ उसके व्यवहार को उजागर करती है। आदमी और प्रकृति के बीच असंतुलन को बताती है । आदमी मतलब को समझदारी का रूप दे दिया है । 

यह कविता हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि कैसे हमारी नीयत और कार्य हमारी और समाज की जिंदगी को प्रभावित करते हैं। पढ़िए इस पर कविता 👇 

✨ कविता: सच्चाई आदमी की ✨

आदमी की अच्छाई सामने है,

बुराई छुपी है।

बस वक्त आने दो,

उसकी नीयत दिखाई दे जाएगी।

ये भाईचारा, इंसानियत की बातें फ़ालतू हैं,

ये बातें खुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए सीखी जाती हैं।

ये जितने नामचीन हस्तियाँ हैं,

दूसरों की तरफ उसकी उंगलियाँ सदा उठी रहती हैं।

न जाने कितने बरसों से हमें प्रेम सिखा रहे हैं,

जिसने जिंदगी में कभी मोहब्बत नहीं सीखी है। ❤️

चीटियों ने झूंड बनाया

मिलकर काम किया,

सहयोग, निरंतरता और व्यस्तता से,

ज़मीं को उलट-पलट दिया।

धीरे-धीरे घर की दीवारों की रेत ले गई कहीं,

आदमी ने ध्यान नहीं दिया,

चींटियों ने ध्यान दिया,

और घर की दीवारें कमजोर हो गईं।

जिसमें आदमी दब गया और मर गया।

मेरी कविताएँ

आदमियों को पसंद नहीं आईं।

मैं देखता रहा—

नदी, तालाब, पेड़, पहाड़,

चिड़ियों की चहचहाहट,

हवाओं की आहट।

और आदमी देखता रहा—

मतलब,

इन सभी चीजों में।

इसलिए पेड़ काट दिए,

पहाड़ों का कद छोटा किया,

नदी की धारा मोड़ दी,

जहाँ मतलब था वहाँ पेड़ गिरा दिए।

इस तरह घोंसला स्वतः टूट गया,

और चिड़ियां रो-रो कर मर गईं,

जिसे देखा नहीं किसी आदमी ने। 🕊️

-राजकपूर राजपूत "राज "

sachchai-aadmi-ki kavita


🌟 और अंत में कविता 🌟

यह कविता यह संदेश देती है कि इंसान की नीयत और व्यवहार केवल उसके लिए नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज के लिए भी मायने रखते हैं।

सच्चाई यह है कि इंसान जितना सतर्क और संवेदनशील रहेगा, उतनी ही प्रकृति और जीवन सुरक्षित रहेंगे।

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