वो महफ़िलें नहीं रहीं | बदलते रिश्तों और यादों पर हिंदी कविता badalte rishte hindi kavita

वो महफ़िलें नहीं रहीं | बदलते रिश्तों और यादों पर हिंदी कविता badalte rishte hindi kavita


समय के साथ केवल परिस्थितियाँ ही नहीं बदलतीं, बल्कि लोगों के दिलों में बसे भाव, रिश्तों की गर्माहट और यादों की चमक भी बदल जाती है। कभी जो महफ़िलें जीवन से भरी लगती थीं, वे धीरे-धीरे ख़ामोश हो जाती हैं। लोग मिलते तो हैं, पर पहले जैसी आत्मीयता नहीं रहती। प्रस्तुत कविता उसी बदलती भावनाओं, फीकी पड़ती चाहतों और स्मृतियों की कसक को अभिव्यक्त करती है।

वो महफ़िलें नहीं रहीं कविता 

वो महफ़िलें नहीं रहीं,
वो चाहतें नहीं रहीं।
नदी की धार भी ठहरी-सी है,
वो हलचलें नहीं रहीं।
चेहरे सभी मुरझाए लगते हैं,
दिल में वो खुशियाँ नहीं रहीं।
भूल गए हैं लोग पुरानी बातें,
आँखों में वो तड़प नहीं रही।
आँखें उसने फेरी नहीं थीं,
मगर पहले जैसी कशिश नहीं रही।
मिलते हैं आज भी वही लोग,
पर बातों में वो अपनापन नहीं रहा।
हँसी तो अब भी गूँजती है महफ़िलों में,
मगर दिल को छूने वाला कारण नहीं रहा।
वक़्त ने कुछ यूँ बदले हैं रिश्तों के रंग,
कि पास होकर भी कोई पास नहीं रहा।

और अंत में कविता 

कुछ बदलाव धीरे-धीरे आते हैं और हमें तब महसूस होते हैं जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं। रिश्तों की सच्ची गर्माहट, चाहत और आत्मीयता जीवन की सबसे अनमोल पूँजी हैं। जब वे कम होने लगती हैं, तब महफ़िलें भी पहले जैसी नहीं लगतीं।
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---राजकपूर राजपूत''राज''

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