एकांत का संघर्ष: आत्मसंवाद और जीवन की सच्चाई The Struggle of Solitude: Self-Dialogue and the Truth of Life

एकांत का संघर्ष: आत्मसंवाद और जीवन की सच्चाई The Struggle of Solitude: Self-Dialogue and the Truth of Life जीवन केवल सुख और दुःख का संगम नहीं है, बल्कि यह हमारे भीतर चलने वाले संघर्षों और आत्मसंवाद की एक गहरी यात्रा है। जब इंसान अकेला होता है, तब वह खुद से सबसे सच्ची बातचीत करता है। यही एकांत उसे गिरकर उठना, हारकर जीतना और खुद को पहचानना सिखाता है। यह कविता उसी आंतरिक संघर्ष, प्रयास और ईश्वर की प्रेरणा को दर्शाती है।

एकांत का संघर्ष: आत्मसंवाद और जीवन की सच्चाई The Struggle of Solitude: Self-Dialogue and the Truth of Life


तारीफ़ करूँ मैं उसकी,
जिसने मुझे बनाया है।
मिट्टी का पुतला हूँ, पगले,
क्षणभर के लिए बनाया है।
अहसासों का खेल है जीवन,
सुख-दुःख इसलिए बनाया है।
मेरी कोशिश में है सब कुछ यहाँ,
सारी कायनात मेरे लिए बनाया है।
तुमने सुनी होंगी
वो एकांत की आवाज़ें,
भीतर ही भीतर चलने वाले द्वंद्व,
जिनमें असफलता मिली कई बार,
लेकिन कोशिश की हज़ार बार।
खड़ा रहा,
लड़ता रहा,
अकेले ही कई बार।
अजीब-सी उत्सुकता चलती थी
अन्तर्मन में,
लेकिन फिर भी
खुद से बातचीत की
अपने एकांत में।
निर्णय लिया—
फिर से संघर्ष किया जाए,
परिणाम चाहे कुछ भी हो।
इन्हीं एकांत की गई बातें
ईश्वर की प्रेरणा समान हैं,
जो तैयार कर देती हैं
सबसे लड़ने के लिए।

मैंने देखा है 

उन तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग के बीच में 
हिन्दू के ईश्वर को 
अपने अस्तित्व को 
हमेशा विवाद में पड़ते हुए 
अन्य पंथों, मजहबों से 
उन तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को 
डरते हुए 
उनके अस्तित्व पर 
विवाद नहीं कर पाए 
तब महसूस हुआ 
बाक़ी पंथों का ईश्वर 
हिन्दुओं के ईश्वर जितना 
विशाल हृदय नहीं रखता है 
जो अपनी आलोचनाओं को सहन नहीं कर सकते हैं !!!

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---राजकपूर राजपूत''राज''


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