नज़र न चुराओ – प्रेम, तड़प और आत्मसम्मान पर गहरी हिंदी कविता Don't Steal Glances Poem

प्रेम सिर्फ पाने का नाम नहीं है, बल्कि यह इंतज़ार, तड़प और आत्मसम्मान का भी दूसरा रूप है।
कभी-कभी हम उस व्यक्ति के लिए तरसते रहते हैं, जो हमारी भावना को समझ ही नहीं पाता।
यह कविता उसी अधूरेपन, सच्चाई और आत्मसम्मान की कहानी है—
👉 जहाँ प्रेम है, लेकिन झुकाव नहीं।

✍️ कविता: नज़र न चुराओ
नज़र न चुराओ,
दिल न बहलाओ,
तुम तो मेरी तलाश हो—
मुझे यूँ न तड़पाओ।
कुछ बात अधूरी है,
कहना भी ज़रूरी है,
तुमने नज़रें फेर लीं—
कहो, क्या मजबूरी है?
क्या यूँ तड़पाना ज़रूरी है?
प्रेम प्यासा था,
बस एक तेरी आशा था,
मेरी तड़प फूट पड़ी,
रोने की अभिलाषा था।
तुम्हें देखा तो लगा—
मेरा मन अधूरा है,
तेरे पास आकर जाना,
यही जीवन पूरा है।
मैं प्यासा ही सही,
मगर खारा समंदर नहीं,
मैं बहती हुई नदी हूँ,
जो सींचती है बंजर ज़मीन को।
नव पल्लव उगाती हूँ,
हरियाली की आस जगाती हूँ,
अपनी ही धुन में बहती,
अपनी ही खुशी पाती हूँ।
मैं माँगता कुछ भी नहीं,
भले प्यासा ही सही,
न लूटा किसी देश को,
न धरा किसी भेष को।
छल-बल मैं जानता ही नहीं,
फिर भी प्यासा ही सही,
न किसी के विचार से बंधा,
न किसी के प्यार से अंधा।
न चली राजनीति की तलवार से,
न किया मीठे बोल का व्यापार,
न बहकाया किसी को मैंने,
न खुद ही हुआ कभी लाचार।
सच की राह पर चलता हूँ,
भले राह कठिन सही,
झूठ के साए में जीने से—
मैं प्यासा ही सही।



यह कविता उस व्यक्ति की भावनाओं को दर्शाती है जो प्रेम में सच्चा है, लेकिन फिर भी अधूरा रह जाता है।
यह बताती है कि आत्मसम्मान के साथ जीना, झूठे प्रेम से बेहतर है।
सच्चा प्रेम कभी भी मजबूरी नहीं बनता।
जहाँ तड़प है लेकिन सम्मान भी है—
👉 वही प्रेम सच्चा होता है।

“अगर यह कविता आपके दिल को छू गई हो, तो इसे शेयर जरूर करें।”


---राजकपूर राजपूत''राज''

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