जिंदगी का इशारा और आत्मविश्वास – प्रेरक कविता zindagi-ka-ishara-kavita

जिंदगी का इशारा और आत्मविश्वास – प्रेरक कविता

आजकल देश की तुलना दूसरे देशों से की जाती है । अमेरिका और चीन जैसे देश कितने तरक्की कर रहे हैं । एक हमारा देश है ... । इतना कहकर बहुत निराशा में चलें जाते हैं । ऐसे लोगों को सुनने वाले भी ठीक हताशा को ग्रहण करते है । नफरती आलोचक को सही मान लेते हैं । जबकि उसकी बुद्धि सियासी होती है । पढ़िए इस पर कविता 👇 

जिंदगी का इशारा 

जिंदगी का इशारा न मिला,
ढूँढा बहुत मगर सहारा न मिला।
मेरी कश्ती है बीच मझधार में,
जिसे माझी का सहारा न मिला।
सिर्फ उसी से उम्मीद थी मुझे,
जिसकी बाहों का सहारा न मिला।
अब मेरी आंखों में चमक नहीं है,
वो बिछड़े इस तरह, दोबारा न मिला।

💔 अपनों और झूठे भरोसे की पीड़ा
जिस देश का आत्मविश्वास टूटा हो,
काबिल है, मगर अपनों ने लूटा हो।
उसकी तुलना बताती है कि सब बेहतर है,
क्या कहें इतनी हताशा, और आदमी झूठा हो।
थकाने के तरीके उसके अलग हैं,
इशारा कुछ और, तारीफ़ झूठी हो।
नफरती आलोचना करके कबीर बन गए,
खुद के मैल न धोएं, जब आदमी झूठा हो।

🎭 व्यंग्य और कबीर की कठिनाई
जब कोई इशारों से व्यंग्य करता है,
तब लगता है कबीर ज़रूर बनेंगे।
ईश्वर नहीं होता है,
बड़ी आसानी से कह रहा है,
ईश्वर को न मानने वालों को कुछ नहीं लग रहा है।
यहीं बात तथाकथित कबीर जैसे लोगों ने नहीं कहा,
जहां गला कटने या रेतने का डर था,
तब महसूस हुआ,
कबीर होना बहुत कठिन है।
-राजकपूर राजपूत "राज "

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🌟 और अंत में कविता 🌟

सहारा और इशारा हमेशा आसानी से नहीं मिलता।
अपनों पर भरोसा टूटने पर आत्मविश्वास बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
सच्चाई और व्यंग्य के माध्यम से जीवन के कठिन अनुभवों को समझा जा सकता है।
ऐसे अनुभव हमें सिखाते हैं कि कबीर जैसी सच्चाई और साहस की जरूरत है, जो डर और धोखे के बीच भी कायम रहे।





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