भूख, विचार और मनुष्य | प्रेम, समाज और लालच पर चिंतनशील हिंदी कविता prem samaj aur lalach par kavita

भूख, विचार और मनुष्य - कविता prem samaj aurlalach par kavita


यह कविता प्रेम, समाज, आलोचना और मनुष्य की बढ़ती हुई लालसाओं पर केंद्रित है। एक ओर प्रेम की निस्वार्थ भावना है, तो दूसरी ओर विचारों की दुनिया में दिखावा, तर्कों का दुरुपयोग और स्वार्थ की बढ़ती भूख दिखाई देती है। कविता यह प्रश्न उठाती है कि क्या मनुष्य केवल पेट की भूख से संचालित है, या उसके भीतर सम्मान, प्रेम और सत्य की भी कोई प्यास शेष है। पढ़िए इस पर कविता हिन्दी 👇 

मैं हार भी जाऊॅं तो कोई ग़म नहीं
तुम्हें खुशी होगी ये बात कम नहीं
तेरे दर्द को खुद में समेट रहा हूॅं मैं
सुकूॅं है तेरी यादों के सिवा कुछ काम नहीं !!!

भूख पर कविता

कहने वाले कहते हैं 
आलोचनात्मक शैली में 
कोई कबीर नहीं है 
है कोई आवारा घुमता हुआ गली में 

कोई जिम्मेदारी नहीं, ज्ञानचंद बन कहना है 
सोशल मीडिया पर जो रहना है 

हार जाएगा ज्ञान धूर्तता की तर्कों से 
बंदूक की नोक से 
स्क्रिप्ट जो बनाते हैं नेताओं के कहने पर 
मन नहीं भरता जिसके तलवे चाटने पर 

वहीं बेड़ा उठाएं है अभिव्यक्ति की आजादी पर 
मुखर हो गया है, ज्ञान देने पर !!!

मुक्तिबोध प्रेरित कविता


मुक्तिबोध की कविताएं में 
भूख है, 
दो टूक है 

और लोगों ने भी पढ़ा 
भूख 
जैसे मुक्तिबोध ने कहा 
पेट और भूख 
खा गए सारे सुख 

अब आदमी ढूंढता है 
अपनी भूख को 
आदमी के भीतर 
आदमी को लुटने को 

भूख इतनी बढ़ी 
हर कोई में चढ़ी 

एक दूसरे को 
खाने को !!!!

अंतिम प्रश्न

यदि मनुष्य मनुष्य को ही
प्रतिस्पर्धा और स्वार्थ की दृष्टि से देखने लगे,
यदि संवेदनाएँ पीछे छूट जाएँ,
तो फिर सभ्यता का अर्थ क्या रह जाएगा?
प्रेम, करुणा और सत्य के बिना
केवल भूख का विस्तार होगा,
और मनुष्य
मनुष्य से दूर होता जाएगा।




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