सियासत और रिश्तों का हिसाब – विस्तारित कविता : siyasat-rishton-ka-hisab- Poetry

सियासत और रिश्तों का हिसाब – विस्तारित कविता : siyasat-rishton-ka-hisab- Poetry 

वो सियासत करते रहे,

आप ताली बजाते रहे,

और लोग बस देखते रह गए।

बस्ती जल रही थी,

घर और रिश्ते दोनों नष्ट हो रहे थे,

आप बस समर्थन करते रहे।

सच कभी सामने आते नहीं,

झूठ का पर्दा हर जगह डालते रहे।

हर इंसान जो आवाज़ उठाता,

उसे बहलाकर चुप कराया गया।

उन्मादी स्वभाव है तुम्हारी,

व्यर्थ के चिल्लाते रहे,

और न्याय की मांग करने वाले

बस अकेले रह गए।

चलो! लोग यह तो जान गए,

उसे क्या करना है, मान गए,

लेकिन हर इंसान के मन में

एक शंकित सवाल बचा।


बाजार में सब्जी खरीदते समय,

हमें दिखता है वही व्यवहार।

उसे विश्वास है कि यहां हर चीज़ लूट है,

और इस भरोसे में उसने

अपना हित बचाया।

दो-चार पैसे छुड़ाने का,

मोल भाव करके

सब्जी के दाम कम करवा लिए,

खुद को लुटने से बचा लिया,

और वह खुश है।

बेचने वाले ने यही सोचा कि:

“इससे दो पैसे कम मिला तो क्या हुआ?

आदमी कंजूस था तो क्या हुआ?

अभी भी फायदे में हूं,

समान बिका,

वह खुश है।”

ऐसे ही जब दो लोग मिलते हैं,

हिसाब-किताब होते हैं,

और जहां हिसाब-किताब होते हैं,

रिश्ते नहीं, व्यापार होता है।

रिश्तों का आदान-प्रदान केवल

लाभ और नुकसान के हिसाब से।

भावनाओं की कोई जगह नहीं,

सिर्फ व्यक्तिगत स्वार्थ और चालाकी।

और यही समाज का सच है।

जहां इंसानियत के मूल्य

अंधाधुंध सियासत और स्वार्थ के पीछे दब जाते हैं।

जहां न्याय मांगने वाले

अकेले रह जाते हैं,

और झूठ बोलने वाले

खुश और सुरक्षित रह जाते हैं।

🔹 संदेश और विचार

समाज में रिश्तों की मूलभूत कीमत केवल तब बचती है

जब लोग इंसानियत और दया को महत्व दें।

झूठ और छल के असर लंबे समय तक समाज पर पड़ते हैं।

यह कविता हमें सोचने पर मजबूर करती है कि

रिश्तों में व्यापार की जगह

विश्वास और सहयोग क्यों महत्वपूर्ण हैं।

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---राजकपूर राजपूत''राज'


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