अपना अपना नज़रिया- अस्तित्व और प्रेम – हिंदी कविता astitva-aur-prem-kavita

🌸अपना अपना नज़रिया- अस्तित्व और प्रेम – हिंदी कविता astitva-aur-prem-kavita 🌸

हर इंसान अपने दृष्टिकोण से दुनिया को देखता है।
कभी-कभी वही नजरिया हमारे अस्तित्व और पहचान को प्रभावित करता है।
यह कविता इंसान की सामाजिक वास्तविकता, प्रेम और आत्म-परिचय की भावनाओं को दर्शाती है।

✨ कविता: अस्तित्व और प्रेम ✨

अपने-अपने नजरिए हैं,
कोई खुद को बेहतर मानते हैं,
कोई दूसरों को।
यही है सच:
जो खुद को मानते हैं,
अगर मानते हो दुनिया को खुद से बेहतर,
तो मिटा जाते हो अपना अस्तित्व।
दुनिया में ऐसे पहचान नहीं पाओगे।
कभी खुद को इस दुनिया में,
महत्वहीन लोगों के बीच,
तुम्हें जाना जाएगा सदा।


प्रेम का ठेका नहीं लिया है यहां किसी ने।
न ही उम्मीद रखना।
सत्रह बार दया करके मारा गया चौहान,
कायरता को साहस और प्रयास कह कर समझाया गया।
भाईचारा भी एक दिन,
परिवर्तित कर देगा तुम्हें।
तुम्हारा अस्तित्व मिटा कर,
अपनी पहचान देकर कह देगा:
“मैंने प्रेम का ठेका लिया है,
मेरे जैसा हो जाओ!” 


शाम हुई और सब सो चुके थे,
रात, गांव का तालाब,
तारे झिलमिलाते थे।
पानी के हिलोर में,
पूरा गांव अपना अस्तित्व खो चुका था।
गहरी नींद में सो चुका था,
मानो अभी उनकी उपस्थिति नहीं है।
चांद कटा हुआ, सफ़र कर रहा था,
इर्द-गिर्द सितारे साथ चल रहे थे।
अपने अस्तित्व को बताते हुए,
धीरे-धीरे चांद धरती के कोने में छुपने लगा।
और मुझे लगा, धरती गोल है,
चांद अभी चक्कर लगा रहा है धरती का।
सुबह में। 🌄
-राजकपूर राजपूत "राज "

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🌟 और अंत में कविता 🌟

यह कविता यह संदेश देती है कि अस्तित्व, पहचान और प्रेम केवल दिखावे या अधिकार से नहीं बनते।
हमें अपने नजरिए, सोच और कार्य से ही वास्तविक पहचान और सम्मान मिल सकता है।
सच्चा प्रेम, भाईचारा और आत्म-ज्ञान ही इंसान को समाज में स्थायी रूप से जीवित रखते हैं।

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