आधुनिक शहर की रोशनी के बीच मानवीय अकेलेपन को दर्शाती हिंदी कविता tere shahar mein jo soonapan hai
आज का शहर रोशनी से जगमगाता है, लेकिन मनुष्य के भीतर का अंधेरा बढ़ता जा रहा है। ऊँची इमारतें हैं, तेज़ रफ़्तार है, सुविधाएँ हैं, पर आत्मीयता, अपनापन और संवेदनाएँ धीरे-धीरे कम होती दिखाई देती हैं। प्रस्तुत कविता आधुनिक जीवन के इसी विरोधाभास को चित्रित करती है, जहाँ बाहरी चमक के बीच भीतर का सूनापन लगातार बढ़ रहा है।
सभ्यता केवल इमारतों, तकनीक और सुविधाओं से नहीं बनती। उसका वास्तविक आधार मनुष्य की संवेदनशीलता, प्रेम, विश्वास और परस्पर सम्मान है। यदि दिलों का उजाला बुझ जाए, तो शहर की लाखों रोशनियाँ भी उस अंधकार को दूर नहीं कर सकतीं। इसलिए सच्ची प्रगति वही है, जहाँ विकास के साथ मानवता भी जीवित रहे।
तेरे शहर में जो सूनापन है
तेरे शहर में जो सूनापन है,
लगता नहीं यहाँ इंसान है।
बल्बों से जगमग गलियाँ सारी,
मगर दिलों में खालीपन है।
दिमाग़ तेज़ है ढेरों किताबों से,
दिल के जज़्बात से अनजान है।
सुविधा ही बन गई है मंज़िल,
त्याग का पथ अब वीरान है।
हर चेहरा अपने में खोया,
हर रिश्ता जैसे मेहमान है।
ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हैं,
मगर आँगन अब सुनसान है।
बातें होती हैं मानवता की,
व्यवहार में कितना अवसान है।
प्रश्न बहुत हैं हर विषय पर,
उत्तर देने में कौन महान है?
शब्दों से युद्ध जीत लेते हो,
मन जीतना कहाँ आसान है।
ज्ञान अगर विनम्रता न लाए,
तो वह केवल अभिमान है।
राम हों या रावण—दोनों से,
सीखना ही सच्चा ज्ञान है।
केवल विरोध के लिए विरोध,
न बुद्धि है, न सम्मान है।
प्रेम जहाँ आधार बन जाए,
वहीं मनुष्य की पहचान है।
वरना जगमग इस दुनिया में भी,
भीतर-भीतर घना श्मशान है।
इन्हें भी पढ़ें 👉 मेरी पहली कमाई कहानी

0 टिप्पणियाँ