मैं तो चला क्षितिज पार दोस्तों | आत्मजागरण और स्वतंत्र सोच पर हिंदी कविता

मैं तो चला क्षितिज पार दोस्तों | आत्मजागरण और स्वतंत्र सोच पर हिंदी कविता main to chala kshitij paar doston

जीवन केवल साँस लेने का नाम नहीं, बल्कि जागरूक होकर जीने का नाम है। जो व्यक्ति केवल भीड़ का अनुसरण करता है, वह अपने भीतर की संभावनाओं को खो देता है। यह कविता साहस, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्र चिंतन का संदेश देती है।

प्रेरणादायक हिंदी कविता

मैं तो चला क्षितिज पार, दोस्तों

तुम जीना कब शुरू करोगे?

तुम लड़ना कब शुरू करोगे?

ये उदासियाँ

तुम्हें तोड़ देंगी;

मुस्कुराकर जीना

कब शुरू करोगे?

भीड़ को ही

सुरक्षा मान बैठे हो,

अकेले चलने का साहस

कब शुरू करोगे?

यहाँ हर किसी को

तुम्हारी परवाह नहीं होगी;

आँखों में आँखें डालकर

सच कहना

कब शुरू करोगे?

मैं तो चला

क्षितिज पार, दोस्तों—

तुम अपने क्षितिज की ओर

चलना कब शुरू करोगे?

हर मीठी बात

सच नहीं होती;

शब्दों के पीछे छिपे

इरादे पढ़ना

कब शुरू करोगे?

जो केवल सुविधा के अनुसार

अपने विचार बदलते हैं,

उन्हें पहचानना

कब शुरू करोगे?

दूसरों की कमियाँ गिनने से पहले,

अपने भीतर झाँकना

कब शुरू करोगे?

चयनात्मक सोच से ऊपर उठकर,

निष्पक्ष होकर सोचना

कब शुरू करोगे?

जो साथ छोड़कर चले जाएँ,

उन्हें जाने दो;

जो सच्चे हैं,

उन्हीं के साथ चलना

कब शुरू करोगे?

मैं तो चला

क्षितिज पार, दोस्तों—

तुम अपनी उड़ान

कब शुरू करोगे?

और अंत में कविता 

मनुष्य का सबसे बड़ा संघर्ष दूसरों से नहीं, बल्कि अपने भय, भ्रम और जड़ सोच से होता है। जो व्यक्ति स्वतंत्र रूप से सोचना और साहस के साथ जीना सीख लेता है, वही अपने जीवन का वास्तविक क्षितिज पार करता है। भीड़ का हिस्सा बनने से अधिक महत्वपूर्ण है—अपने सत्य के साथ खड़े होने का साहस।

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---राजकपूर राजपूत''राज''




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