मौन भगवान और मनुष्य की इच्छाएँ ishwar karma aur santosh-kavita

मौन भगवान और मनुष्य की इच्छाएँ ishwar karma aur santosh-kavita


मनुष्य और ईश्वर का संबंध केवल पूजा, प्रार्थना और माँगने तक सीमित नहीं है। सदियों से लोग अपनी इच्छाएँ, दुख, आशाएँ और सपने ईश्वर के सामने रखते आए हैं। लेकिन एक प्रश्न हमेशा बना रहता है—क्या ईश्वर केवल देने के लिए हैं, या वे हमें कुछ समझाने भी आए हैं? प्रस्तुत कविता इसी प्रश्न पर विचार करती है। इसमें श्रद्धा, कर्म, इच्छाओं की सीमा और मनुष्य की बढ़ती अपेक्षाओं का चित्रण है।

ईश्वर और मनुष्य कविता 


पत्थर यूं ही भगवान नहीं होते 
क्या उसके दिल में अरमान नहीं होते 

सुनते हैं सबकी इसलिए मानते हैं सभी
यकीं है कुछ कह देते तो भगवान नहीं होते !!!

भगवान से मांगने से पहले इंसान बड़े हो गए 
सुविधाएं मांगी इतनी,कि पेट बड़े हो गए 

मुक्तिबोध ने लिखा इस तरह की आदमी शोषित है 
इंसानों के बनाएं नियम, भगवान पर सवाल खड़े हो गए  !!!!


इच्छाओं का विस्तार
भगवान से माँगने से पहले
इंसान बड़े हो गए।
सुविधाएँ इतनी माँगीं,
कि इच्छाएँ पेट से भी बड़ी हो गईं।
कभी रोटी माँगी जाती थी,
फिर घर माँगा गया,
फिर वैभव,
फिर प्रतिष्ठा,
और फिर दूसरों से आगे निकलने की चाह।
इच्छाओं का विस्तार हुआ,
लेकिन संतोष का दायरा
उतना नहीं बढ़ा!!!

जीवन दर्शन कविता


ईश्वर किसकी सुनते हैं?
माँगने हर कोई जाता है,
ईश्वर सुने तो किसकी सुनें?
किसी को धन चाहिए,
किसी को सफलता,
किसी को सम्मान,
किसी को प्रेम।
हर व्यक्ति अपनी-अपनी इच्छा लेकर
ईश्वर के द्वार पहुँचता है।
लेकिन शायद
ईश्वर उन लोगों को भी सुनते हैं,
जो कुछ माँगते नहीं,
केवल कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
जो शिकायतों से अधिक
विश्वास लेकर आते हैं !!!!

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ishwar karma aur santosh-kavita



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