गाँव से शहर: यादें, बदलाव और रिश्तों की सच्चाई कविता village to city life poem गाँव से शहर की यात्रा केवल स्थान बदलने की नहीं होती, बल्कि यह भावनाओं, यादों और रिश्तों के बदलने की कहानी होती है। जब कोई पहली बार गाँव छोड़कर शहर जाता है, तो उसके दिल में बचपन, खेत-खलिहान और अपनों की यादें बस जाती हैं। लेकिन समय के साथ नई यादें पुरानी को पीछे छोड़ देती हैं। यह कविता उसी दर्द, बदलाव और जीवन की सच्चाई को दर्शाती है।
गाँव से शहर: यादें, बदलाव और रिश्तों की सच्चाई कविता village to city life poem
याद आ गई मुझे उलझे हुए इस संसार में
जो कहे थे कभी क्या रक्खा है मेरे यार में
यादें हैं कई पीपल और पगडंडी की डगर में
जिंदगी की तलाश में जो आ गए थे शहर में
गिल्ली डंडा और छुपम छुपाई के वो मेल में
अद्भुत खुशी मिली थी मुझे बचपन की बहार में
जब शाम होगी तो राज़ हिसाब होगा सभी का
क्या रक्खा था तेरे उस उजड़े हुए दयार में !!!
गांव से शहर
गाँव से शहर जाने वाले,हाँ, पहली बार जाने वाले,यादों के सहारे रोते हैं।पीपल का पेड़,खेत का मेड़,तालाब का पानी,गुज़री जवानी—बहुत रुलाते हैं।सालों बाद जब वापस आते हैं,फिर लौटकर जाते हैं,तो नहीं रुलातीं वही यादें,जो शहर जाने के बाददिल में नई यादें बसा लेते हैं।
वापस सब-कुछ जस के तस नहीं मिलता
हर मूल का ब्याज नहीं मिलता
एक बार फटे कपड़े को
कोई दर्ज़ी जस के तस नहीं सिलता
जिसके मतलब निकल गए हैं मुझसे
वो दुबारा मुझसे दिल से नहीं मिलता !!!
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---राजकपूर राजपूत''राज''

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