अब की दुनिया और आदमी | बदलते रिश्तों पर हिंदी कविता
समय के साथ केवल तकनीक और जीवनशैली ही नहीं बदलती, बल्कि लोगों के व्यवहार, रिश्तों और संवाद करने के तरीके भी बदल जाते हैं। आज के दौर में शब्द अधिक हैं, पर आत्मीयता कम दिखाई देती है। लोग मिलते हैं, बातें करते हैं, लेकिन अक्सर उनके शब्दों और भावनाओं के बीच दूरी महसूस होती है। प्रस्तुत कविता इसी बदलती सामाजिक प्रवृत्ति, दिखावे, ज्ञान के अहंकार और प्रेम की दुर्लभता पर एक चिंतन है।
अब की दुनिया कविता
अब की दुनिया है ये किस तरह,
बातें नहीं करते आदमी की तरह।
दुआ-सलाम करते हुए चलते हैं,
जैसे झूठ हो किसी सच की तरह।
वो शख़्स खुद से ही परेशान है बहुत,
जो बोल रहा है विद्वान की तरह।
सवाल करना आसान है यहाँ पर,
जवाब दे कोई समझदार की तरह।
उनके इरादे कुछ और लगते हैं,
जो बोलते हैं बहुत इंसान की तरह।
चेहरों पर मुस्कान, दिलों में फ़ासले,
रिश्ते निभते हैं अब औपचारिकता की तरह।
हर कोई अपने सच का व्यापारी है,
बिकता है विचार भी बाज़ार की तरह।
इश्क़ आसान नहीं, "राज़" क्या जाने,
नहीं मिलते अब कोई देवदास की तरह।
मोहब्बत अब भी है दुनिया में कहीं,
पर लोग ढूँढ़ते हैं उसे सुविधा की तरह।
आदमी बेचारा नहीं है यहां कोई
बस अवसर नहीं मिला है चालाक की तरह
और अंत में कविता
मनुष्य की पहचान केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, संवेदनशीलता और ईमानदारी से होती है। दुनिया चाहे कितनी भी बदल जाए, सच्चाई, आत्मीयता और प्रेम का महत्व कभी कम नहीं होता।
___ राजकपूर राजपूत 'राज'
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