अक्सर होता है: प्रेम, धोखा और मानव स्वभाव की कविता Ghazals on Social kavita
प्रेम और इंसानियत का रिश्ता हमेशा सरल नहीं होता। कभी सच्चा प्यार भी सामाजिक परिभाषाओं, व्यक्तिगत लालसा और स्वार्थ के बीच दब जाता है। इस कविता में कवि ने मानव स्वभाव की कमजोरियों और प्रेम की वास्तविकता को मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया है।
कभी-कभी इंसान रिश्तों को समझने और निभाने में असफल हो जाता है। उसका इरादा सही होता है, लेकिन लालसा, धोखा और भ्रम प्रेम को विकृत कर देते हैं।
🖋️ अक्सर होता है कविता
यही होता है अक्सर,
कोई रोता है अक्सर,
किसी से इश्क करके
कोई पछताता है अक्सर,
जितनी शिद्दत से चाहो,
धोखा मिलता है अक्सर,
वो जान गए कि हम सीधे हैं,
बेवकूफ समझता है अक्सर,
पढ़े-लिखे की दुनिया में
रिश्ता टूटता है अक्सर।
ढूंढने के तरीके हैं
पक्षियों ने ढूंढ लिया अपना भोजन,
उड़े वहीं तक
और भर लिया संतुष्ट अपना जेहन।
जानवरों ने वहीं तक दौड़ा,
जहां मिला उसको भोजन।
मगर इंसानों ने
हर जगह मांगा,
अतिरिक्त सुविधा,
आराम की चीजें।
दौड़ा, जहां उसको नज़र आई
उम्मीदें, मतलब की।
प्रेम से बातें के बीच भी
उसकी आंखें ललचाई,
और विकृत किया प्रेम को,
थकाया, छकाया भी,
जिसका नाम ही दिया –
“प्रेम”।
🖋️ और अंत में कविता
प्रेम का असली अर्थ है समर्पण, समझ और संवेदनशीलता।
इंसानी लालसा और सामाजिक दबावों के बीच सच्चा प्रेम दब जाता है।
कविता यह संदेश देती है कि जीवन में प्रेम, मानव स्वभाव और लालसा के बीच संतुलन बनाए रखना ज़रूरी है।
हमें रिश्तों की असली पहचान और महत्व समझना चाहिए।
-राजकपूर राजपूत "राज "
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