कितना प्यारा मौसम है प्रकृति पर हिंदी कविता patjhad se hariyali tak kavita
आधुनिक जीवन में हम कैलेंडर की तारीख़ों, अंग्रेज़ी महीनों और उत्सवों को तो याद रखते हैं, लेकिन प्रकृति के अपने कैलेंडर को धीरे-धीरे भूलते जा रहे हैं। ऋतुओं का आगमन किसी शोर या घोषणा के साथ नहीं होता। वे चुपचाप आती हैं और अपने रंगों से धरती का रूप बदल देती हैं। वसंत भी ऐसी ही ऋतु है, जो पतझड़ के बाद नवजीवन और नई आशा का संदेश लेकर आती है। पढ़िए इस पर कविता हिन्दी 👇
हिंदी प्रकृति कविता
कितना प्यारा मौसम है
बस तू नहीं यही ग़म है
खिले हैं कई फूल यहॉं
मगर तेरे बिना ये कम है
ढूंढता हूॅं तुझे इन्हीं नजारों में
तेरी यादों में मेरी ऑंखें नम है !!!
ज़रूरत के खातिर उसमें व्यस्तता दिखाई दी
मगर व्यस्तता इतनी जरुरत दिखाई न दी
ये मौसम बदला है चुपके-चुपके
बादल आए, छाए मगर वर्षा की बुंदे दिखाई न दी !!!
पतझड़ और वसंत कविता
वसंत जब आया तो
अंग्रेजी महीना के जनवरी निकल गई थी
हर्षोल्लास से मना कर आदमी थक चुके थे
वसंत का आगमन चुपके-चुपके से हुआ
हिन्दी महीने को कोई नहीं जानता है
पूस को कोई मतलब नहीं
जेठ तो जानता भी नहीं
यही कि वसंत कोई महीना है या ऋतु
लेकिन पतझड़ आया
गिरते हुए पत्तों ने
नए कोंपलें उगाएं
तब तक जब जेठ आएगा
हरियाली छा जाएगी
वसंत को पता है
जेठ का महीना !!!
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