न सुनने की आदत: तर्क, अहंकार और समाज की सच्चाई | हिंदी कविता Hindi Poem on Ego

न सुनने की आदत: तर्क, अहंकार और समाज की सच्चाई | हिंदी कविता Hindi Poem on Ego आज के समय में हर व्यक्ति खुद को सही साबित करने में लगा है, लेकिन सुनने और समझने की क्षमता धीरे-धीरे कम होती जा रही है।
यह कविता उसी प्रवृत्ति पर कटाक्ष करती है—जहाँ तर्क का उपयोग ज्ञान के लिए नहीं, बल्कि अहंकार को साबित करने के लिए किया जाता है।

न सुनने की आदत: तर्क, अहंकार और समाज की सच्चाई | हिंदी कविता Hindi Poem on Ego 


न सुनने की आदत  
न सुधरने की आदत  
सवाल उठाए हो तो जवाब भी ले लेना 
बातों ही बातों में घुमाने की आदत 
सब जानते हैं तेरी फितरत
तेरी मौकापरस्ती की आदत 
सवाल उठाकर बुद्धिजीवी बन गए
अपने गिरेबान में न झांकने की आदत 


(२) 

जब सब पढ़े लिखे हो जाते हैं



जहाँ सब पढ़े लिखे हो जाते हैं 
वहाँ अपने अपने तर्क हो जाते हैं 
हाँ ये तो अच्छी बातें हैं 
मगर तर्क कम बहस ज्यादा हो जाते हैं 
यदि किसी को हराना है  
तो अंदर से तोड़े जाते हैं  

सुधारों इन आदतों को जमाने की  
आदमी को बहलाने की
भटकाने की
तो सुधर जाएगा जमाना  !!

न सुनने की आदत 

न गुनने की आदत 
जो कह दिए सब सही 
दुनिया कुछ भी नहीं मैं सही तो सही 
तर्क ऐसा 
फ़र्क ऐसा 
तू कहीं मैं कहीं 
अहंकार न पाल इस तरह 
एक दिन तू मैं नहीं !!!

यह कविता बताती है कि:न सुनने की आदत: तर्क, अहंकार और समाज की सच्चाई | हिंदी कविता Hindi Poem on Ego 
👉 लोग सुनने से ज्यादा बोलने में विश्वास रखते हैं
👉 तर्क का उद्देश्य समझना नहीं, जीतना बन गया है
👉 अहंकार इंसान को वास्तविकता से दूर कर देता है
“गिरेबान में झाँकना” यहाँ प्रतीक है—
👉 आत्मचिंतन का
🔥 मुख्य संदेश
सुनना भी एक कला है
तर्क का सही उपयोग जरूरी है
अहंकार इंसान को तोड़ देता है
आत्ममंथन ही सुधार का रास्ता है !

Hindi Poem on Ego



---राजकपूर राजपूत

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